सत्यार्थ प्रकाश:निवेदन

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निवेदन

परमपूज्य श्रीस्वामी जी महाराज ने यह ‘सत्यार्थप्रकाश’ ग्रन्थ द्वितीय बार शुद्ध करके छपवाया है। प्रथमावृत्ति में अन्त के कई प्रकरण कई कारणों से नहीं छपे थे सो भी इस में संयुक्त कर दिये हैं। इस ग्रन्थ में आदि से अन्तपर्य्यन्त मनुष्यों को वेदादिशास्त्रानुकूल श्रेष्ठ बातों के ग्रहण और अश्रेष्ठ बातों के छोड़ने को उपदेश लिखा गया है।

मतमतान्तरों के विषय में जो लिखा गया है वह प्रीतिपूर्वक सत्य के प्रकाश होने और संसार के सुधरने के अभिप्राय से लिखा गया है, किन्तु निन्दा की दृष्टि से नहीं। इस ग्रन्थ का मुख्य उद्देश्य यही है कि अविद्याजन्य नाना मतों के फैलने से संसार में जो द्वेष बढ़ गया है इस से एक मतावलम्बी दूसरे मतानुयायी को द्वेषदृष्टि से देखता है वह दूर हो के संसार में प्रेम और शान्ति स्थिर हो ।

जिस प्रेम और प्रीति से श्रीस्वामी जी महाराज ने यह ग्रन्थ बनाया है उसी प्रीति से पाठकों को देखना चाहिए। पाठकों को उचित है कि आदि से अन्त तक इस ग्रन्थ को पढ़ कर प्रीतिपूर्वक विचार करें। क्योंकि जो मनुष्य इस के एक खण्ड को देखेगा उस को इस ग्रन्थ का पूरा-पूरा अभिप्राय न खुलेगा ।

आशा है कि जिस अभिप्राय से यह ग्रन्थ बनाया गया है उस अभिप्राय पर पाठकगण दृष्टि रख कर लाभ उठावेंगे और ग्रन्थकर्त्ता के महान् परिश्रम को सफल करेंगे ।

इस ग्रन्थ में कई स्थलों में टिप्पणिका की आवश्यकता थी इसलिए मैंने जहाँ-जहाँ उचित समझा वहाँ-वहाँ लिख दी हैं।

यह ग्रन्थ प्रथमावृत्ति में छपा था उस को बिके बहुत दिन हो गये इस कारण से शतशः लोगों की शीघ्रता छपने के विषय में आई, इस कारण से यह द्वितीयावृत्ति अत्यन्त शीघ्रता में हुई है। छापते समय ग्रन्थ के शोधने और विरामादि चिह्नों के देने में जहाँ तक बना बहुत ध्यान दिया परन्तु शीघ्रता के कारण से कहीं भूल रह गई हो तो पाठकगण ठीक कर लें ।

सूचना

चौदहवें समुल्लास में जो कुरान की मंजिल, सिपारा, सूरत और आयत का ब्यौरा लिखा है उस में और तो सब ठीक है परन्तु आयतों की संख्या में दो चार के आगे पीछे का अन्तर होना सम्भव है अतएव पाठकगण क्षमा करें ।

संवत् १९३९

आश्विन कृष्णपक्ष

(मुन्शी) समर्थदान

प्रबन्धकर्ता, वैदिकयन्त्रालय

प्रयाग