सर्वस्व आर्यों का सर्वगुण निधान है।

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सर्वस्व आर्यों का सर्वगुण निधान है।

सर्वस्व आर्यों का सर्वगुण निधान है।
वर वन्दनीय वेद की महिमा महान् है ॥
है ज्ञान, कर्म, भक्ति का उत्कृष्ट समन्वय
रहते हैं सर्वकाल ये, हो सृष्टि वा प्रलय ।
निःश्रेयसाभ्युदय का है साधन ये असंशय
फल चार का दाता है यही वेद-चतुष्ट्य ।

यह तर्क-युक्ति-पूर्ण विज्ञानानुकूल है सब
काल सभी को ये सौख्य-शान्ति-मूल है।
साहित्य सर्वमान्य वेद का पुनीत है कल्पित
कहानी ये न गड़रिये का गीत है।
हीरा है सच्चा वो, तू काँच समझा है
जिसे रे! देख वेद को तू वेद की ही दृष्टि से ।

मत-दीपों में कहीं जो चमकते हैं दिव्य कण
ज्योतित उन्हें हैं कर रही ये वेद-रवि-किरण।
मत-पन्थ अन्य जितने भी प्रचलित हैं ये नूतन
हाँ ! वेद सर्वश्रेष्ठ सभी से है पुरातन ।
प्रत्यक्ष यहाँ सृष्टि का सम्वत् प्रमाण है।
वर वन्दनीय वेद की महिमा महान् है ॥

वेदों को मिटा दे ये भला किसकी ताब है
है ज्ञान ये अक्षय, न कोई ये किताब है।
पानी में वेदज्ञान कभी गल नहीं सकता
यह वेद आग में भी कभी जल नहीं सकता ॥

वेदों के ग्रन्थ हाँ, विधर्मियों ने जलाए
हम्माम अपने गर्म कई साल कराए पर,
मूढ़ पक्षपातियों ने ये भी न जाना
ग्रन्थों का जलाना नहीं वेदों का जलाना।
वेदों की ऋचा लता-लता, पात-पात, वृक्षों पर
फूलों पै फलों पर है वो चोटी पै जड़ों पर।

मानव-समाज पशु व पक्षियों के गात पर सागर,
तरंग, सरिता-तटों, जल-प्रपात पर।
पर्वत व पर्वतों के गगनचुम्बी शिखर पर
ब्रह्माण्ड के कण-कण पै भी हैं वेद के अक्षर।

जिस काल ने मिटाए हैं यूँ लोक बृहत्तर
अक्षर अशुद्ध को ज्यों मिटा देता है रबर,
वेदों को मिटा सकता न वो काल भयंकर
अंकित हैं वेद-वाक्य काल के भी भाल पर।
हाँ! अमर ईश का ये अमर वेद-ज्ञान है।
वर वन्दनीय वेद की महिमा महान् है ॥

आर्यों ने वेद के लिए बलिदान किये हैं
हँसते हुए कराल गरल पान किये हैं।
फाँसी पै चढ़ गए प्रचण्ड अग्नि में जले
कुचले गए वो हाथियों के पाँव के तले ।
लोहे के गर्म चिमटों से तन खाल खिंचाई
जिह्वा कटाई, आँख सलाखों से फुड़ाई।

भालों कृपाणों बाणों से छिवाए अंग-अंग
जीवन के अन्त क्षण भी ये मन में रही उमंग,
फिर जन्म लेंगे वेद का उद्धार करेंगे अभिशाप,
पाप, ताप अखिल जग के हरेंगे।
हम आर्यों को वेद ही प्राणों का प्राण है।
वर वन्दनीय वेद की महिमा महान् है ।।

है वेद की शिक्षा जियो, औरों को जीने दो
सुख-शान्ति का प्याला पियो, औरों को पीने दो
है ओत-प्रोत सारे ही ब्रह्माण्ड में ईश्वर
उसके हैं सब पदार्थ ये न भूल कभी नर।
हाँ! त्याग-भाव से सदा इनका प्रयोग कर
लालट के वशीभूत हो पर-धन कभी न हर।

मुख से भला कहो, भला देखो, भला सुनो
हाँ! साध्य भले के लिए साधन भले सुनो।
सबके विचार एक हों, आचार एक हो।
होवे न परस्पर घृणा, व्यवहार नेक हो
जीवन में ओत-प्रोत ये वैदिक विचार हो
निश्चय मनुष्यता का चतुर्दिक प्रसार हो।

प्राणी समस्त विश्व के होंगे सुखी अभय
बोलेंगे सभी प्रेम से वैदिक धरम की जय !
शिव, सत्य, सुन्दरम् ‘प्रकाश’ का ये गान है।
वर वन्दनीय वेद की महिमा महान् है ॥