सर्वद्रष्टा-सर्वशक्तिमान

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य एक इत्तमु ष्टुहि कुष्टीनां विचर्षणिः। पतिर्जज्ञे वृषऋतुः

। ऋ. १.४५.१६

तर्जः बरद नीलु निन्न हेतरा

हे मानव! किस किस की करता फिरता है स्तुति ?
स्तुत्य जनक रक्षक पालक एक है विश्वापति॥
॥हे मानव ॥

तू जाने हर किसी को समझ बैठा अपना पालक (2)
करने लग जाता है स्तुति, जो दीखता धन का धनी॥
॥ हे मानव ॥

तू समझता लब्ध प्रतिष्ठ रोब वाले को स्वामी (2)
गीत स्तुति के गाने लगता, देख दार्शनिक या कवि॥
॥ हे मानव ॥

जीवित या निर्जीव आकृति पर है तेरी जीविताशा (2)
मोहित सौन्दयों में आबन्ध क्यों, है तेरी आवृत्ति ॥
॥हे मानव ॥

ऐन्द्रियक विषयों की स्तुतियों से हुआ मानव मृदित।
और जो हैं अज्ञानी लोग जागृत करते ना मति । (2)
॥हे मानव ॥

कुछ हैं रक्षक ज्ञानी ध्यानी आनन्दी आर्यक-आत्मज्ञ (2)
पर विचर्षणि, वृषक्रतु गुण कर्म स्वभाव वाले कति ?
॥ हे मानव ॥

एक ही केवल प्रभु है स्तुत्य वस्तुओं के हैं स्त्रोत (2)
स्तुतियाँ सैकड़ों की कर स्तुति बस ईश की॥
॥ हे मानव ॥

सांसारिक सुख में जाग जाते हैं छल-छिद्र (2)
महासूर्य के सामने हैं विषयी-किरणें क्षुद्र ही॥
॥हे मानव ॥

क्षुद्र ज्ञान व बल मनुष्य का पारक-पालन क्या करे?
पर है इन्द्र विचर्षणि है वृषक्रतु पालक पति।
॥ हे मानव ॥

सर्वदृष्टा दृहित-दृष्टि दीन बन्धु की है दिव्य (2)
सब यही जाने कि ईश्वर बिन नहीं मिलती गति ॥
॥ हे मानव ॥

कर्म दृढ़ संकल्प ‘इन्द्र का’ एक सोच में है सफल (2)
फिर से उसको सोचने की ना जरूरत है कभी ॥
॥हे मानव ॥

हार्दिक स्तुतियाँ हमारी, हंस की हेतुक बनें (2)
एक ही महासूर्य है मधवन, मधुर मन से करें स्तुति॥
॥हे मानव ॥

(लब्ध प्रतिष्ठ) प्रतिष्ठा पाया हुआ। (दार्शनिक) दर्शन शास्त्रों से परिचित। (जीविताशा)
जीने की उम्मीद। (आबन्ध) प्रदर्शन करना। (मृदित) मसल दिया गया। (आर्यक-आत्मज्ञ
आदरणीय पुरुष। (विवर्षणि) सर्वदृष्टा। (वृषकृतु) सर्वशक्तिमान। (कति) कहाँ। (आरक्ष)
रक्षक। (क्षुद्र) अधम, नीच। (पारक) उद्धारक। (दृहित-दृष्टि) विकसित अवलोकन ।
(हेतुक) उपकरण। (मथवन) इन्द्र। (महासूर्य) प्रकाशक परमात्मा। (आवृत्ति) एक ही
काम करना, दोहराना। (छल छिद्र) धूर्तता।