सन्यासी के समान पापहन्ता

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१२३२३४५१२ ३२य ३५

इन्द्रस्तुराषाणिमित्रो न जघान वृत्रं यातिर्न।

३१२ ३४५ ३२ २५२य १२२ १२

विभेदं वलं भृगुर्न ससाहे शत्रून्मदे सोमस्य ॥ साम.६५४

तर्जः पुरिनाद रारी मुत्त पुरिनाद

बन जाओ ईश्वर-मित्र

ईश्वर तो है सुहृत

आओ ले लें मित्र से मैत्रिक प्यार

यतिरूप प्रभु हैं सत्य

वो हैं परिपक्व प्रज्ञ॥ ॥बन जाओ।

भक्ति प्रेम सोमरस का

दें प्रभु को उपहार

‘सुर’ स्वभाव अति कर्म शील

ना है अकर्मण्यता॥ ॥बन जाओ

जैसा स्वयं है कर्मण्य

अन्यों का बने प्रेरक

भुजा कर्मण्य की थामें

प्रेरक पथिप्रज्ञ वो ही रहे ॥ ॥बन जाओ।॥

प्रेरणा जो अनसुनी करे

चोट-चपेटों से चेता देवे

अग्नि, ऋत की सहिष्णु है

अनृत से वो परे रहे।॥ ॥ बन जाओ।

असुरों का यति वध करे

सुचरित्रों को आयद करे

यति महान हैं इन्द्र प्रभु

सर्वेष्णाओं से मन हो परे॥ ॥ बन जाओ।

मेघ सम प्रभु व्यापक वितत

पाप से ढके वृत्रासुर हरें

पुण्य-पवि रवि किरणों को

पापाचार से मुक्त करें।॥ ॥बन जाओ॥

ज्ञानी परिपक्व जैसे गुरु

शिष्यों कर तम दूर करें

हृत्पटल से जीवात्मा के

अविद्या हरे ज्योति-ज्वल करे ॥ ॥ बनजाओ॥

प्रेम पूरित सोम रस

प्रभु को अर्पित यदि करें

प्रभु आनन्द विभोर हो

काम क्रोधादि रिपु हरें॥ ॥ वन जाओ।

(सुहत) मित्र, बन्धु। (यति) सन्यासी, त्यागी। (परिपक्व) अत्यंत पका हुआ। (प्रज्ञ) बुद्धिमान। (तुर) वेगवान। (पविप्रज्ञ) ज्ञान मार्ग पर चलने वाला। (सहिष्णु) सहन करने वाला। (अनृत) असत्य, झूठ। (असुर) राक्षस। (आयद) समतुल्य, अनुरूप। (ऐष्णा) इच्छा। (क्तित) विस्तृत, विपुल। (ज्वल) शोभा, वैभव। (रिप) शत्रु।