सानु सुत्तेया कौन जगाैंदा, ऋषिवर तेरे बिना ।

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सानु सुत्तेया कौन जगाैंदा, ऋषिवर तेरे बिना ।

तर्ज: सानु एक पल चैन ना आवे सजना तेरे बिना

सानु सुत्तेया कौन जगाैंदा, ऋषिवर तेरे बिना ।
साड्डे बिछड़े कौन मिलौंदा ऋषिवर तेरे बिना ।।

श्रद्धानन्द ने खाई बताओ क्यों गोली ।
आर्य मुसाफिर खेले, लहू से क्यों होली ।
इन्हे राह ते कौन लगौंदा, ऋषिवर तेरे बिना।।

दुश्मन ज़माना था, दयानन्द निराला ।
खाए ईंट पत्थर पीया ज़हर का प्याला ।
सानु अमृत कौन पिलौंदा, ऋषिवर तेरे बिना ।।

किसे हाल वी तू छड्डी न सच्चाईयाँ ।
दूर कित्ती कौम दी तू लख्खा बुराइयाँ ।
साड्डी बिगड़ी कौन बनौंदा ऋषिवर तेरे बिना ।।

दयानन्द की अग्नि से, लेकर शरारे ।
उठो आर्य वीरो कसम खाओ सारे ।
साड्डा होर न कोई होणां, ऋषिवर तेरे बिना ।।

रचना:- कंचन कुमार