ऋग्वेद के दशम मंडल में वर्णित संगठन सूक्त
ऊँ संस॒मिद्युवसे वृष॒न्नग्ने॒ विश्वा॑य॒र्य आ।इळस्प॒दे समिध्यसे स नो॒ वसून्या भर॥ 1॥
अर्थ-हे धर्मनिरत विद्वानों ! आप परस्पर एक होकर रहें, आपस में मिलकर प्रेम पूर्वक वार्तालाप करें। सामान मन होकर ज्ञान प्राप्त करें। जिस प्रकार श्रेष्ठजन एकमत होकर ज्ञानार्जन करते हुए ईश्वर की उपासना करते है, उसी प्रकार आप भी एकमत होकर विरोध त्याग करके अपना काम करें।
सं ग॑च्छध्वं सं व॑दध्वं स॑ वो मनांसि जानताम्। दे॒वा भागं यथा पूर्वे संजाना॒ना उ॒पास॑ते ॥ 2॥
अर्थ-हम सबकी प्रार्थना एक सामान हो, भेद-भाव से रहित परस्पर मिलकर रहें, अंतःकरण-मन-चित्त-विचार सामान हों। मैं सबके हित के लिए सामान मन्त्रों को अभिमंत्रित करके हवि प्रदान करता हूँ।
स॒मा॒नो मन्त्रः समितिः सम॒नि स॑मा॒नं मनः स॒ह चित्तमॆशाम्। स॒मा॒नं मन्त्रम्॒भिमन्त्रये वः सम॒नेन॑ वो ह॒विषा जुहोमि॥ 3 ॥
अर्थ-तुम सबके संकल्प एक सामान हों, तुम्हारे हृदय एक सामान हों और मन एक सामान हों, जिसके जिससे तुम्हारा कार्य परस्पर पूर्णरूप के संगठित हो।
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः। स॒मा॒नाम॑स्तु वो॒ मनो॒ यथा॑ वः सुष॒हास॑ति॥ 4॥
अर्थ-सभी के दिल तथा संकल्प अविरोधी हो और मन प्रेम से भरे हों जिससे सुख-संपदा बड़े ॥










