सदा गावः शुचये विश्वधायसः। सदा देवा अरेपसः ।।
साम. ४४२
तर्जः पूवे उरु मलयुत्तम नी कविलीकदिन्यवो
गौओं में पवित्रपन है जो हैं विश्वधाया,
दोषरहित निष्पाप हैं छल छिद्र रहित, अमाया,
निर्दोष दिव्यताओं को आदर्श हम बनायें
बनके स्वयं समुज्ज्वल गुण वैसा उपजायें
इन्द्र वरुण यम विष्णु रुद्र अग्नि का हो साया॥ ॥ गौओं में॥
अमृतमय दुग्ध पिलाकर करती हैं गौरों पोषण
गौओं का पय तो अमी है गोबर, नवनीतोत्तम
उसके तो मूत्र से होते कितने ही रोग निवारण
वेदों की वाणियाँ गौरों हैं जिनके पवित्र स्वन
वेद वाणियाँ करें पावन, मन्त्रज्ञ करते गायन
शुचि मन्त्रों का ये उपदेश जीवन का बने सहारा
॥ गौओं में ॥
तीजी गौ सूर्य किरणें, करें शर से शर्वर-शमन
मेघों का प्रखर प्रभा से करती कृतार्थ जनन
वसूत्तम बनती वसुधा वर्षधर जब बरसे
वनस्पति प्राणियों के, मन हृदय रस सरसे
मन बुद्धि देह इन्द्रियाँ (2) आत्मा सब शुद्ध बनते
विश्व में आनन्द शांति की देवें तद्रूप छाया।।
॥ गौओं में॥
निर्मल निर्दोष जो होते, दिव्य देव वही कहाते
शालीन शिव श्रेयस्कर श्रेष्ठ समाज बनाते
सूर्यचन्द्र अग्नि वायु ऋतु संवत्सर हैं दैविक
माता पिता विप्राचार्य गुरु अतिथि देव कहाते
यदि गति में इनकी दोष आये (2) चक्र सृष्टि के बिगड़ें
गति निर्दोष है क्योंकि इनमें दृढ़ देवत्व समाया॥
॥ गौओं में॥
इन्द्र विष्णु रुद्र वरुण यम सब तेरे हैं ऋजु रूप
सब हैं पवमान प्रतिष्ठित परिपूर्ण ज्योति स्वरूप
निभ्रम निर्दोष निरागस, निरातंक तू है निरूप
तेरा ध्रुव ध्यान धरें बन जायें परिपूत
छलछिद्र छद्म होवे छिन्न (2) उज्जवल जीवन बना दें
उत्तम उज्जवल पायें प्रभुजी तेरी शीतल छाया।
॥ गौओं में॥
(विश्वछाया) विश्व का पालक। (छलछिद्र) कपट व्यवहार। (छग्य) धोखा। (अमाया)
पवित्रता सच्चाई। (पय) दूध। (अमी) अमृत। (नवनीत) मक्खन। (स्वन्) शब्द। (मन्त्रज्ञ)
मन्त्र को जानने वाले। (शुचि) पवित्र। (शर) वाण। (शर्बर) अन्धकार, तम। (शमन)
निवृत्ति, दूर करना। (कृताब) सन्तुष्ट, दक्ष। (जनन) जनम, पैदा करना। (वसुधा) धरती।
(वर्षघर) बादल। (तद्रूप) समान, तुल्य। (ऋजु) सरल। (निर्ब्रम) शंका रहित।
(निरागस) पाप। (निरांतक) भय रहित। (परिपूत) पूर्ण पवित्र।










