सब कुछ लुटा के होश में आये तो क्या किया।।

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सब कुछ लुटा के होश में आये तो क्या किया।।

सब कुछ लुटा के होश में आये
तो क्या किया।।
राहों में खुद ही शूल
बिछाये तो क्या किया।।
इच्छाओं की बारात
सजा स्वप्न लोक में,
चादर से ज्यादा पांव
फैलाये तो क्या किया।।१।।

मुश्किल से मिल सका
था मौसम बहार का,
फागुन में भी ना मुस्कराये
तो क्या किया ।। २।।

टकराये हर कदम पर
उजालो से भागकर,
जलते हुऐ चिराग
बुझाये तो क्या किया ।।३।।

भुखे को चार रोटी
यदि पानी न दे सके,
पत्थर पे लाख फूल
चढ़ाये तो क्या किया।।४।।

शों हया की चादर सुरेन्द्र
उतार कर बदनामियों के
दाग लगाये तो क्या किया ।।५।।