रथारोही का उद्बोधन

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यं कुमार नवं रथे मच॒क्रं मन्साकृणोः ।

एक॑षं वि॒श्वतुः प्राञ्च॒ मप॑श्य॒न्नधिं तिष्ठसि ॥ ऋ १०.१३५.३

तर्जः पुलयिल यन्द कादल उदने जेतदः

मानव जाग, जीवन को लक्ष्य दे
रथ को उधर ही मोड़ जहाँ अन्तिम लक्ष्य है।
रथ का समय तो शत वर्ष का है
रथ का निर्वाह सही ढंग से कर
बैठ तू ना आँखें बन्द कर
तीव्र गति से रथ आगे कर॥
मानव जाग…

(1) इक रथ है बिन पहिये चलता, सदा नवीन ही रहता
उसमें ईषा-दण्ड लगा है, चहुँ दिशि दौड़ा करता
इक शरीर, इक मेरूदण्ड है, जिसमें आत्मा रहता
रथि आत्मा बुद्धि सारथी, इन्द्रियाँ घोड़े मन लगाम है।
बन गया रथ अब चलने दे, इसको चलाना ठीक से सीख ले,
वरना लक्ष्य पे पहुँच कठिन है, बीती जवानी तो दिन कम हैं मानव जाग…

(2) अनुपम रथ पे बैठ के अब तक पहुँच चुका होता
पर तू आँखें मूँद के बैठा, रह गया तू सोता
लक्ष्य अगर मालूम नहीं तो, कैसे रथ को जोता?
सारथी का कोई दोष नहीं है रथारोही खोटा
ना उच्च लक्ष्य है ना दृढ़ संकल्प, अनभीष्ट मार्ग है बुद्धि है अल्प
खा रहा चक्कर यूँ ही व्यर्थ, जीवन का ना लक्ष्य ना अर्थ… मानव जाग…

(3) इक दिन रथ तुझसे छिन जाएगा, फिर पछताएगा
इसलिये सारथी को आदेश दे, सही मार्ग ले जाएगा
जो निर्धारित लक्ष्य है तेरा भूल ना जाएगा
प्रेरणा वेद की हृदयंगम कर, पूर्ण सफल हो जाएगा।
बन्धु प्रभु, तू सामर्थ्य दै, जीवन रथ का चालन-वल दे
उत्तम लक्ष्य पे सरपट चल के दृढ़ संकल्प से सही राह का बल दे॥

मानव जाग…

(ईषादण्ड) मेरूदण्ड (अनभीष्ट) अनिष्ट कर अनैच्छिक (हृदयांगम) मन में बैठा हुआ।