इन्द्र प्र णो रथमव पश्चच्चित्सन्तमद्रिवः । पुरस्तादेनं मे कृधि
॥ ऋः ८.८०.४
तर्जः माझी व्यथा नाही कुणाशी बोलतो
हे इन्द्र! मेरे रथ की,
रक्षा तुम करो,
जीवन का रथ पिछड़ा हुआ
अवनति में ये तो उलझ गया।
हे इन्द्र! इसे परिरक्ष करो॥
॥ हे इन्द्र॥
मेरे देखते ही देखते, मेरे साथी आगे निकल गये,
कोई घृति से कोई धर्म से, कोई त्याग तप से संभल गये,
ना विवेक है ना वैराग्य है, मैं क्या करूँ भगवन् कहो ?
॥ हे इन्द्र ॥
कुछ कर्म योगी कर्मशूर, कुछ ज्ञानी रथ ज्ञानों से पूर
इनके रथों में प्रखर संवेग, पीछे से आके भी निकले दूर हे
वज्रवाले इन्द्र ! मेरे रथ को शुभ पथ पर तुम धरो ॥
॥ हे इन्द्र ॥
परिमंद रथ मेरा हुआ, रक्षा करो प्रकष्टतया।
तव इन्द्र-बल की करो वृष्टि, रथ पाये सुगति करो दया,
कभी हो ना मेरी अवगति, मेरे आत्म-अश्व में बल भरो ॥
॥ हे इन्द्र॥
ग रे ग म प ग ऽरे सा नी सा रक्षा करो
ग रे ग प नी सा नी प ग ध प रे ग सा
(रथ) शरीर। (अवनति) नीचे गिरना। (परिरक्ष) चारों ओर से बचाना। (वृति) धैर्य,
दृढ़ता, दृढ़संकल्प। (विवेक) सत्यज्ञान। (वैराग्य) संसारी बन्धनों से विरक्त। (कर्मशूर)
कर्मवीर, उद्योगी, परिश्रमी। (प्रखर) तेज, अत्यंत तीक्ष्ण। (संवेग) उत्तेजना। (बज) इन्द्र
का अस्त्र। (परिमंद) अत्यन्त धीमा। (प्रकष्टतया) श्रेष्ठता से, उदारता से। (आत्म-अश्व) आत्मा रूपी घोड़ा।










