महान गणितज्ञ और विलक्षण प्रतिभा ✨🔢
आधुनिक गणितज्ञों में श्रीनिवास रामानुजम् का नाम पूरे विश्व में अत्यंत आदर और श्रद्धा के साथ लिया जाता है। 🌍🙏 उनका जन्म 22 दिसंबर 1887 को तमिलनाडु के कुंभकोणम् नामक स्थान में हुआ था। 🏡 उनके पिता श्रीनिवास अयंगर की कपड़े की दुकान थी 🏬 और माता कोलम्माल एक बुद्धिमान व धार्मिक महिला थीं। 🌺 उनकी दादी नामगिरि देवी की परम भक्त थीं, और परिवार को विश्वास था कि रामानुजम् का जन्म देवी की कृपा से हुआ है। 🕉️✨
बचपन और प्रारंभिक शिक्षा 🎒📚
जब रामानुजम् केवल पांच वर्ष के थे, तब उन्होंने गाँव की पाठशाला में प्रवेश लिया। 🏫 दो साल बाद, उन्हें कुंभकोणम् टाउन हाई स्कूल में दाखिला मिला। 🏛️ गणित के प्रति उनकी रुचि बचपन से ही अद्भुत थी! 🔢💡 वह हमेशा इस प्रश्न का उत्तर खोजते रहते थे कि “गणित का सबसे बड़ा सत्य क्या है?” 🤔🔍
उनकी विलक्षण बुद्धि देखकर शिक्षक भी चकित रह जाते थे! 😲📖 कई बार तो वे खुद रामानुजम् के कठिन प्रश्नों का उत्तर देने में असमर्थ हो जाते थे। 😅
गणित में अद्वितीय प्रतिभा 🧮🔢
जब रामानुजम् 10वीं कक्षा में थे, तब उन्होंने B.A. स्तर की त्रिकोणमिति (Trigonometry) का पूरा अध्ययन कर लिया था! 😲📊 पाश्चात्य गणितज्ञ लोनी द्वारा लिखित ट्रिगोनोमेट्री की किताबें उन्होंने इतनी तेजी से आत्मसात कर लीं कि उन्होंने उसमें आवश्यक संशोधन तक कर दिए! ✍️📖
संघर्ष और गणितीय शोध 📜🔬
🔹 नौकरी की तलाश में वे मद्रास (चेन्नई) गए और इंडियन मैथेमेटिकल सोसाइटी के उच्च अधिकारी श्री रामास्वामी अय्यर से मिले। 💼📑
🔹 उन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज के प्रोफेसर श्री शेषु अय्यर को एक पत्र लिखा, जिससे उन्हें ऑफिस में लेखन कार्य मिला। लेकिन यह नौकरी भी जल्द ही छूट गई। 😞💔
🔹 इसके बाद नेल्लूर जिले के जिलाधीश श्री आर. रामचंद्रन के माध्यम से पोर्ट ट्रस्ट में लिपिक की नौकरी मिली, जहाँ उनका वेतन मात्र ₹25 प्रति माह था। 💰📝
लेकिन नौकरी के साथ-साथ उनकी गणित साधना भी लगातार चलती रही! 🧠✨ 1911 में, उनका 14 पृष्ठों का शोधपत्र और 9 गणितीय प्रश्न एक प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित हुए, जिससे उन्हें ₹75 की छात्रवृत्ति मिली। 📜🏆
लंदन यात्रा और हार्डी के साथ कार्य ✈️📖
👉 रामानुजम् ने एक पत्र विश्व प्रसिद्ध गणितज्ञ G.H. हार्डी और J.E. लिटिलवुड को भेजा। ✉️📨
👉 इस पत्र में उन्होंने अपने स्वयं के खोजे हुए गणितीय सूत्र लिखे थे, जो बेहद प्रभावशाली थे! 🔢📝
👉 हार्डी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने रामानुजम् को कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी आने का निमंत्रण दिया। 🎓🇬🇧
अद्भुत गणितीय क्षमता और योगदान 🎯🧠
🔢 रामानुजम् की संख्याओं को पहचानने और गणना करने की शक्ति अद्वितीय थी। ✨
🔢 वे बीजगणित (Algebra) और अनंत श्रेणी (Infinite Series) के विशेषज्ञ थे। 📊
🔢 उन्होंने रामानुजन प्राइम संख्या, डिविजन फंक्शन और मॉक थीटा फंक्शन जैसे कई गणितीय सिद्धांत दिए। 🏆🔢
रामानुजम् का अंतिम समय और विरासत 💔🌿
👉 अत्यधिक परिश्रम और स्वास्थ्य की अनदेखी के कारण रामानुजम् का स्वास्थ्य खराब होने लगा। 🤒💔
👉 32 वर्ष की अल्पायु में, 26 अप्रैल 1920 को वे इस दुनिया को छोड़कर चले गए। 😢🕊️
महान गणितज्ञ G.H. हार्डी ने उनके बारे में लिखा –
“रामानुजम् को जो यश और मान्यता मिली, वह किसी अन्य भारतीय को मिलती तो वह बहुत खुश होता। लेकिन सत्य यह है कि रामानुजम् सिर्फ गणितज्ञ ही नहीं, बल्कि एक महान व्यक्तित्व थे!” 🌟
रामानुजम् से हमें क्या सीखने को मिलता है? 📖✨
✅ संसाधनों के अभाव में भी यदि मेहनत और लगन हो, तो कोई भी व्यक्ति महानता के शिखर तक पहुंच सकता है। 🚀
✅ कठिनाइयों और संघर्षों से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि अपने लक्ष्य पर अडिग रहना चाहिए। 🎯
✅ ज्ञान और जिज्ञासा से ही सफलता प्राप्त होती है। 📚🔍
निष्कर्ष 🎯
श्रीनिवास रामानुजम् का जीवन हम सभी के लिए प्रेरणादायक है। ✨ उनका संघर्ष, मेहनत और गणित के प्रति समर्पण यह सिखाता है कि सच्ची लगन और मेहनत से कुछ भी संभव है! 💪📖
आज भी रामानुजम् के शोध और सूत्र गणित की दुनिया में अमर हैं! 🌍🔢
उनकी जयंती 22 दिसंबर को राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाई जाती है! 🎉🇮🇳
“गणित के इस महान विभूति को कोटि-कोटि नमन!” 🙏✨
विस्तृत जीवन परिचय

आधुनिक गणितज्ञों में श्री निवास रामानुजम् का नाम समग्र विश्व में अत्यन्त आदर व श्रद्धा से लिया जाता है। आपका जन्म 22 दिसम्बर 1887 में तमिलनाडु के कुंभकोणम् ग्राम में हुआ था। आपके पिता श्रीनिवास आयंगर की अपनी कपड़े की दुकान थी। आपकी माता कोलम्माल एक तेजस्वी बुद्धिमती धार्मिक स्त्री थी। आपकी दादी मां भी इनके साथ ही रहती थी और वह नामगिरि देवी की परमभक्त थी। आयंगर दंपत्ति को विश्वास था कि नमागिरि देवी की कृपा से उनके वहां रामानुजम् का जन्म हुआ है।
पांच वर्ष की अवस्था में रामानुजम् ने गांव की पाठशाला में प्रवेश लिया। दो वर्ष के बाद आपको कुंभकोणम् टाऊन हाईस्कूल में दाखिल किया गया। गणित की ओर रामानुजम् को आरम्भ से ही विशेष अभिरुचि थी। आप सदा एक प्रश्न का समाधान ढूंढने रहते थे कि गणित का सबसे बड़ा सत्य क्या है ?
रामनुजम् की विलक्षण बुद्धि को देखकर आपके शिक्षक भी आश्चर्यचकित हो जाया करते थे। अनेक बार वे भी अपने इस शिष्य के प्रश्नों के उत्तर देने में अपने आपको असमर्थ मानते थे।
रामानुजम् की विलक्षण बुद्धि के कुछ उदाहरण अद्भुत हैं। दसवीं कक्षा में पढ़ते थे तब ही आपने बी.ए. की त्रिकोणमिति का अभ्यास पूर्ण कर लिया था। ऐसा कहा जाता है कि पाश्चात्य गणितज्ञ लोनी द्वारा लिखित ट्रिगोनोमेट्री के ग्रंथों को देखते ही आपने उन्हें आत्मसात् कर लिए थे। इस ग्रंथ में आपने आवश्यक संशोधन भी किए।
नौकरी के लिए मद्रास (चेन्नई) की इण्डियन मैथेमेटिकल सोसायटी के उच्च अधिकारी श्री रामास्वामी ऐयर को मिले। रामास्वामी ने प्रेसिडेन्सी कॉलेज के प्रोफेसर श्री शेषु ऐयर के नाम एक पत्र लिखकर आपको दिया। श्री शेषु ऐयर ने आपको कार्यालय में लिखने के कार्य पर लगा दिया। कुछ ही दिनों में यह काम भी छूट गया। उसके बाद शेषु ऐयर ने नेल्लुर जिले के जिलाधीश श्री आर. रामचन्द्रन के नाम भी पत्र लिख दिया। वहां आपको पोर्ट ट्रस्ट में लिपिकार की नौकरी मिली। वेतन मासिक रु. 25 तय हुए। नौकरी करते हुए भी गणित की साधना निरन्तर चलती रही। सन् 1911 ई. में रामानुजम् का 14 पृष्ठ का शोधपत्र और 9 प्रश्न शोध पत्रिका में प्रकाशित हुए। परिणामस्वरूप रु. 75 की शिष्यवृत्ति आपको विश्वविद्यालय से मिलने लगी।
रामानुजम् ने एक पत्र विश्व प्रसिद्ध गणित के प्राध्यापक श्री जी.एच. हार्डी और श्री जे.ई. लिटलवुड् को लिखा। इस पत्र में रामानुजम् ने गणित के स्वयं शोध किए हुए सूत्र लिखे थे।
आपकी स्मरणशक्ति और संख्या गिनती की शक्ति असाधारण थी। आप बीजगणित की योग्य समझ और अनन्त श्रेणी तक सहज रूप में उसका व्यवहार करने की क्षमता रखते थे। विश्व प्रसिद्ध महान गणितज्ञ प्रो. हार्डी ने आपके मृत्यु समय लिखा था – ”रामनुजम् को प्राप्त यश तथा आपके कार्य को मिली सर्वमान्यता अन्य किसी भारतीय को मिली होती तो आप बहुत ही खुश होते” परन्तु सत्य यह है कि रामनुजम् मात्र एक गणितज्ञ ही नहीं अपितु महान व्यक्ति थे। साधनों के अभाव की स्थिति में भी भीषण संघर्ष करते हुए एक सामान्य व्यक्ति किस प्रकार महानता के उच्च शिखर तक जा सकता है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण रामनुजम् का जीवन था।
साभार___विशाल अग्रवाल










