नमस्ते,
लाला लाजपत राय भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान नायकों में से एक थे। उनके जीवन, संघर्ष और विचारधारा ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को न केवल दिशा दी, बल्कि लाखों लोगों को प्रेरित भी किया। उन्हें “पंजाब केसरी” और “लायन ऑफ पंजाब” जैसे विशेषणों से सम्मानित किया गया। उनका जीवन समाज सेवा, शिक्षा और स्वतंत्रता के लिए समर्पित था। आइए उनके जीवन को विस्तार से समझते हैं।
लाला लाजपत राय भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान नायकों में से एक थे। उनके जीवन, संघर्ष और विचारधारा ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को न केवल दिशा दी, बल्कि लाखों लोगों को प्रेरित भी किया। उन्हें “पंजाब केसरी” और “लायन ऑफ पंजाब” जैसे विशेषणों से सम्मानित किया गया। उनका जीवन समाज सेवा, शिक्षा और स्वतंत्रता के लिए समर्पित था। आइए उनके जीवन को विस्तार से समझते ह
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा‘
लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 को पंजाब के मोंगा जिले के दुधिके गांव में हुआ था। उनके पिता, लाला राधा किशन आजादी जी,एक सरकारी विद्यालय में उर्दू के शिक्षक थे। उनकी माता, गुलाब देवी, धार्मिक और नैतिक मूल्यों से प्रेरित महिला थीं।
लाला राधा किशन जी के विषय में लाला जी स्वयं लिखते हैं की मेरे पिता पर इस्लाम का ऐसा रंग चढ़ा था की उन्होंने रोजे रखना शुरू कर दिया था.
लाला जी की प्रारंभिक शिक्षा रेवाड़ी (हरियाणा) के सरकारी स्कूल में हुई। उन्होंने 1880 में कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा पास की और 1886 में लाहौर गवर्नमेंट कॉलेज से वकालत की पढ़ाई पूरी की। वकालत करते हुए उनका उद्देश्य केवल धन अर्जित करना नहीं था, बल्कि वह इसे समाज सेवा और राष्ट्रीय आंदोलन के माध्यम के रूप में देखते थे।
1885 में उन्होंने लाहोर के गवर्नमेंट कॉलेज से द्वितीय श्रेणी में वकालत की परीक्षा पास की और हिसार में अपनी कानूनी प्रैक्टिस प्रारंभ कर दी ।
आर्य समाज से जुड़ाव
कानून की पढाई के दौरान वह लाला हंसराज जी व पंडित गुरुदत्त जी जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में आये । यह तीनों अच्छे मित्र बन गए और 1882 में आर्य समाज के सदस्य बन गए । उस समय आर्य समाज समाज-सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था और यह पंजाब के युवाओं में अत्यधिक लोकप्रिय था ।
लाला लाजपत राय के जीवन पर स्वामी दयानंद सरस्वती और उनके आर्य समाज आंदोलन का गहरा प्रभाव पड़ा। आर्य समाज की विचारधारा ने लाला जी को भारतीय समाज को जाति, बाल-विवाह और अन्य सामाजिक कुरीतियों से मुक्त करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने आर्य समाज के तहत कई सुधारात्मक कार्य किए और दयानंद एंग्लो वैदिक (DAV) कॉलेज की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आर्य समाज के तीन कक्ष्य थे :
समाज सुधार, हिन्दू धर्म की उन्नति और शिक्षा का प्रसार
वह अधिकांश समय आर्य समाज के सामाजिक कार्यों में ही लगे रहते
आर्य समाज के माध्यम से योगदान:
- सामाजिक सुधार: लाला जी ने विधवा पुनर्विवाह, महिला शिक्षा और छुआछूत को खत्म करने के लिए काम किया।
- शिक्षा का प्रचार: उन्होंने धर्म और शिक्षा के मेल को बढ़ावा दिया।
- धार्मिक चेतना: भारतीय संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए जागरूकता फैलाई।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
लाल-बाल-पाल त्रिमूर्ति
भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस में उन्होंने रचनात्मकता, राष्ट्र निर्माण व आत्मनिर्भरता पर जोर दिया ।
लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल के साथ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के गरम दल के नेता बने। यह तीनों ” लाल-बाल-पाल ” नाम से प्रसिद्ध थे
यह त्रिमूर्ति उस समय के उदारवादी नेताओं के विपरीत, अंग्रेजों के खिलाफ उग्र और सशक्त आंदोलन चलाने में विश्वास रखती थी।
- उन्होंने विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार और स्वदेशी वस्त्रों का उपयोग करने का आग्रह किया।
- गरम दल का उद्देश्य देशवासियों में आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान की भावना को जगाना था।
1907 में जब पंजाब के किसानों में अपने अधिकारों को लेकर चेतना उत्पन्न हुई तो सरकार का क्रोध लालाजी तथा सरदार अजीतसिंह (शहीद भगतसिंह के चाचा) पर उमड़ पड़ा और इन दोनों देशभक्त नेताओं को देश से निर्वासित कर उन्हें पड़ोसी देश बर्मा के मांडले नगर में नजरबंद कर दिया, किन्तु देशवासियों द्वारा सरकार के इस दमनपूर्ण कार्य का प्रबल विरोध किये जाने पर सरकार को अपना यह आदेश वापस लेना पड़ा। लालाजी पुन: स्वदेश आये और देशवासियों ने उनका भावभीना स्वागत किया। लालाजी के राजनैतिक जीवन की कहानी अत्यन्त रोमांचक तो है ही, भारतीयों को स्वदेश-हित के लिए बलिदान तथा महान् त्याग करने की प्रेरणा भी देती है।
1907-08 में उड़ीसा मध्यप्रदेश तथा संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश) से भी भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा और लालाजी को पीडितों की सहायता के लिए आगे आना पड़ा। पुन: राजनैतिक आन्दोलन में 1907 के सूरत के प्रसिद्ध कांग्रेस अधिवेशन में लाला लाजपतराय ने अपने सहयोगियों के द्वारा राजनीति में गरम दल की विचारधारा का सूत्रपात कर दिया था और जनता को यह विश्वास दिलाने में सफल हो गये थे कि केवल प्रस्ताव पास करने और गिड़गिड़ाने से स्वतंत्रता मिलने वाली नहीं है। हम यह देख चुके हैं कि जनभावना को देखते हुए अंग्रेजों को उनके देश-निर्वासन को रद्द करना पड़ा था। वे स्वदेश आये और पुन: स्वाधीनता के संघर्ष में जुट गये।लाला जी मानते थे की राष्ट्रिय हित के लिए विदेशों में भी भारत के समर्थन में प्रचार करने हेतु एक संगठन की जरूरत है ताकि पूरी दुनिया के सामने भारत का पक्ष रखा जा सके और अंग्रेज सरकार का अन्याय उजागर किया जा सके ।
प्रथम विश्वयुद्ध (1914-18) के दौरान वे एक प्रतिनिधि मण्डल के सदस्य के रूप में पुन: इंग्लैंड गये और देश की आजादी के लिए प्रबल जनमत जागृत किया। वहाँ से वे जापान होते हुए अमेरिका चले गये और स्वाधीनता-प्रेमी अमेरिकावासियों के समक्ष भारत की स्वाधीनता का पथ प्रबलता से प्रस्तुत किया।यहाँ से वह अमेरिका गए जहाँ उन्होंने ” इन्डियन होम लीग सोसायटी ऑफ़ अमेरिका ” की स्थापना की और ” यंग इण्डिया ” नामक पुस्तक लिखी ! इसमें अंग्रेज सरकार का कच्चा चिटठा खोला गया था इसीलिए ब्रिटिश सरकार ने इसे प्रकाशित होने से पूर्व ही इंग्लॅण्ड और भारत में प्रतिबंधित कर दिया ! 20 फरवरी, 1920 को जब वे स्वदेश लौटे तो अमृतसर में जलियावाला बाग काण्ड हो चुका था और सारा राष्ट्र असन्तोष तथा क्षोभ की ज्वाला में जल रहा था। इसी बीच महात्मा गांधी ने सहयोग आन्दोलन आरम्भ किया तो लालाजी पूर्ण तत्परता के साथ इस संघर्ष में जुट गये। 1920 में ही वे कलकत्ता में आयोजित कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के अध्यक्ष बने। उन दिनों सरकारी शिक्षण संस्थानों के बहिस्कार विदेशी वस्त्रों के त्याग, अदालतों का बहिष्कार, शराब के विरुद्ध आन्दोलन, चरखा और खादी का प्रचार जैसे कार्यक्रमों को कांग्रेस ने अपने हाथ में ले रखा था, जिसके कारण जनता में एक नई चेतना का प्रादुर्भाव हो चला था। इसी समय लालाजी को कारावास का दण्ड मिला, किन्तु खराब स्वास्थ्य के कारण वे जल्दी ही रिहा कर दिये गये। 1924 में लालाजी कांग्रेस के अन्तर्गत ही बनी स्वराज्य पार्टी में शामिल हो गये और केन्द्रीय धारा सभा (सेंटल असेम्बली) के सदस्य चुन लिए गये। जब उनका पं0 मोतीलाल नेहरू से कतिपय राजनैतिक प्रश्नों पर मतभेद हो गया तो उन्होंने नेशनलिस्ट पार्टी का गठन किया और पुन: असेम्बली में पहुँच गये। अन्य विचारशील नेताओं की भाँति लालाजी भी कांग्रेस में दिन-प्रतिदिन बढऩे वाली मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति से अप्रसन्नता अनुभव करते थे, इसलिए स्वामी श्रद्धानन्द तथा पं0 मदनमोहन मालवीय के सहयोग से उन्होंने हिन्दू महासभा के कार्य को आगे बढ़ाया।
तब 1925 में ही कलकत्ता में हिन्दू महासभा का अधिवेशन आयोजित किया गया। लाला लाजपतराय ने इसकी अध्यक्षता की थी तथा महामना पं.मदन मोहन मालवीय ने उद्घाटन। इसके कुछ दिनों पहले ही आर्य समाज के एक जुलूस के मस्जिद के सामने से गुजरने पर मुस्लिमों ने “अल्लाह हो अकबर” के नारे के साथ अचानक हमला बोल दिया था तथा अनेक हिन्दुओं की हत्या कर दी थी। आर्य समाज तथा हिन्दू महासभा ने हिन्दुओं का मनोबल बनाए रखने के उद्देश्य से इस अधिवेशन का आयोजन किया था।
अधिवेशन में डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी, श्रीमती सरलादेवी चौधुरानी तथा आर्य समाजी नेता गोविन्द गुप्त भी उपस्थित थे। सेठ जुगल किशोर बिरला ने विशेष रूप से इसे सफल बनाने में योगदान किया था। लाला जी तथा मालवीय जी ने इस अधिवेशन में हिन्दू संगठन पर बल देते हुए चेतावनी दी थी कि यदि हिन्दू समाज जाग्रत व संगठित नहीं हुआ तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता की मृग मरीचिका में भटककर सोता रहा तो उसके अस्तित्व के लिए भीषण खतरा पैदा हो सकता है। लालाजी ने भविष्यवाणी की थी कि मुस्लिमबहुल क्षेत्रों में हिन्दू महिलाओं का सम्मान सुरक्षित नहीं रहेगा।
स्वाधीनता सेनानी तथा पंजाब की अग्रणी आर्य समाजी विदुषी कु.लज्जावती लाला लाजपतराय के प्रति अनन्य श्रद्धा भाव रखती थीं। लाला लाजपतराय भी उन्हें पुत्री की तरह स्नेह देते थे। कु.लज्जावती का लालाजी संबंधी संस्मरणात्मक लेख हाल ही में श्री विष्णु शरण द्वारा संपादित ग्रंथ “लाल लाजपतराय और नजदीक से” में प्रकाशित हुआ है। इसमें लज्जावती लिखती हैं- “लालाजी के व्यक्तित्व को यदि बहुत कम शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास करूं तो उपयुक्त शब्द होंगे कि वे देशभक्ति की सजीव प्रतिमा थे। उनके लिए धर्म, मोक्ष, स्वर्ग और ईश्वर पूजा- सभी का अर्थ था देश सेवा, देशभक्ति और देश से प्यार।
विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के सिलसिले में अमृतसर की एक विराट सभा में व्यापारियों की इस बात का कि उनके पास करोड़ों रुपये का विदेशी कपड़ा गोदामों में भरा पड़ा है, अत: उनके लिए विदेशी कपड़ों के बहिष्कार कार्यक्रम का समर्थन करना संभव नहीं है, उत्तर देते हुए उन्होंने कहा था, “आप करोड़ों रुपये के कपड़े की बात कर रहे हैं। मेरे सामने यदि तराजू के एक पलड़े में दुनियाभर की दौलत रख दी जाए और दूसरे में हिन्दुस्थान की आजादी, तो मेरे लिए तराजू का वही पलड़ा भारी होगा जिसमें मेरे देश की स्वतंत्रता रखी हो।”
1928 में सात सदस्यीय सायमन कमीशन भारत आया जिसके अध्यक्ष सायमन थे । इस कमीशन को अंग्रेज सरकार ने भारत में संवेधानिक सुधारों हेतु सुझाव देने के लिए नियुक्त किया था जबकि इसमें एक भी भारतीय नहीं था । इस अन्याय पर भारत में तीव्र प्रतिक्रिया हुई और भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस ने पूरे देश में सायमन कमीशन के शांतिपूर्ण विरोध का निश्चय किया ।
कांग्रेस में भूमिका
वह सभी सम्प्रदायों की भलाई के प्रयास करते थे और इसी का नतीजा था की वह हिसार म्युनिसिपल्टी हेतु निर्विरोध चुने गए जहाँ की अधिकांश जनसँख्या मुस्लिम थी । 1888 में वे प्रथम बार कांग्रेस के इलाहाबाद अधिवेशन में सम्मिलित हुए जिनकी अध्यक्षता मि0 जार्ज यूल ने की थी। उनका जोरदार स्वागत हुआ और उनके उर्दू भाषण ने सभी का मन मोह लिया । अपनी योग्यता के बल पर वह जल्द ही कांग्रेस के लोकप्रिय नेता बन गए । लगभग इसी समय जब सर सैयद अहमद खान ने कांग्रेस से अलग होकर मुस्लिम समुदाय से यह कहना शुरू किया की उसे कांग्रेस में जाने की बजाय अंग्रेज सरकार का समर्थन करना चाहिए तब लाला जी ने इसके विरोध में उन्हें “कोहिनूर” नामक उर्दू साप्ताहिक में खुले पत्र लिखे . इन पत्रों में लाला जी ने सर सैयद अहमद खान को उन्ही के पुराने लेखों की याद दिलवाई जिसमे उन्होंने हिन्दू मुस्लिम एकता की हिमायत करी थी और आज वहीँ सर सैयद अहमद खान हिन्दू और मुसलमान के बीच में दरार उत्पन्न कर रहे हैं. लाला जी को इन लेखों से काफी प्रशंसा मिली! उनके पिता जी ने प्रसन्न होकर उन लेखों को दोबारा छपवा कर वितरित तक किया.
लाला लाजपत राय 1888 और 1889 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशनों में सक्रिय रूप से भाग लिया। वह ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों के कट्टर विरोधी थे।
- 1907 में उन्हें ‘बर्मा निर्वासन’ झेलना पड़ा, क्योंकि उन्होंने ब्रिटिश सरकार की नीतियों के खिलाफ जोरदार आवाज उठाई थी।
- कांग्रेस के भीतर गरम दल और नरम दल के मतभेदों के बावजूद, उन्होंने पार्टी के लिए अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखी।
सायमन कमीशन का विरोध और बलिदान
1928 में जब ब्रिटिश सरकार ने सायमन कमीशन भारत भेजा, तो इसमें कोई भी भारतीय सदस्य नहीं था। लाला लाजपत राय ने इसका विरोध किया।
- 30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन का नेतृत्व करते समय, पुलिस ने बर्बर लाठीचार्ज किया।
- उन्हें गंभीर चोटें आईं, लेकिन उन्होंने कहा:
“मेरे शरीर पर पड़ी हर लाठी अंग्रेजी सरकार के ताबूत में कील साबित होगी।” - इस घटना के कुछ दिनों बाद, 17 नवंबर 1928 को, उनकी मृत्यु हो गई।
लाला जी की शहादत ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों को अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया।
शिक्षा और लेखन में योगदान
लाला लाजपत राय का मानना था कि शिक्षा से समाज में परिवर्तन लाया जा सकता है। उन्होंने कई शैक्षिक संस्थानों की स्थापना की, जिनमें प्रमुख हैं:
- दयानंद एंग्लो वैदिक (DAV) कॉलेज, लाहौर।
- लक्ष्मी नारायण ट्रस्ट।
- पंजाब नेशनल बैंक (PNB) की स्थापना में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
- पंजाब नेशनल बैंक (PNB) एवं लाला लाजपत राय जी का संकल्प
- लाला लाजपत राय द्वारा 19 अप्रैल1895 को लाहौर के प्रसिद्द अनारकली बाजार में हुई थी। इस बैंक की स्थापना करने वालों में लाला हरकिशन लाल (पंजाब के प्रथम उद्योगपति), दयाल सिंह मजीठिया (ट्रिब्यून अख़बार के संस्थापक), लाला लालचंद (DAV कॉलेज के संस्थापककर्ता) राय मूल राज (लाहौर आर्यसमाज के प्रधान), पारसी महोदय जेस्सावाला (प्रसिद्द व्यापारी), बाबू काली प्रसन्न रोय (प्रसिद्द वकील एवं कांग्रेस नेता)आदि थे।
- उस काल में केवल अंग्रेजों द्वारा संचालित बैंक ही देश में थे। अंग्रेज सरकार बहुत कम ब्याज़ दर पर देशवासियों का रूपया बैंक में रखती थी और बहुत अधिक ब्याज़ दर पर ऋण देती थी। देश के संसाधनों के ऐसे दुरूपयोग को देखकर राय बहादुर मूलराज ने लाला लाजपत राय को स्वदेशी बैंक की स्थापना करने की सलाह दी थी। स्वामी दयानन्द के समाज सुधार आंदोलन का एक पृष्ठ PNB बैंक की स्थापना को कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसकी स्थापना करने वाले लोग अधिकतर आर्यसमाजी थे अथवा राष्ट्रवादी थे। इसलिए PNB ने अंग्रेज सरकार से किसी भी प्रकार का सहयोग नहीं लिया। उस समय 2 लाख रुपये की धनराशि से बैंक का आरम्भ किया गया था। PNB देश का ऐसा एकमात्र स्वदेशी बैंक है जो आज भी कार्यरत है। तत्कालीन सभी स्वदेशी बैंक या तो बंद हो चुके है अथवा अधिकृत हो चुके है।
- PNB की स्थापना लाला लाजपत राय ने सामाजिक उत्थान एवं राष्ट्रप्रेम की भावना के चलते किया था। उस काल में निर्धन भारतीय साहूकारों से ऋण लिया करते थे। अशिक्षित किसानों से मनचाही बहियों पर अंगूठा लगवाकर साहूकार मनमाना ब्याज वसूलते थे। अकाल, बाढ़ आदि आ जाते तो किसान पूरा जीवन न उस ऋण से कभी मुक्त होता। न ही अंग्रेजों की कोर्ट कचहरी से न्याय प्राप्त कर पाता। अधिकतर साहूकार अंग्रेजों के पिटठू थे। इसलिए उनका कुछ नहीं बिगड़ता था। अंग्रेजों द्वारा स्थापित बैंक केवल प्रभावशाली लोगों को ऋण देते थे। गरीब भारतीयों की वहां तक कोई पहुँच नहीं थी। लाला जी ने जब इस शोषण और अत्याचार को देखा तो इसका व्यावहारिक समाधान निकालने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने राष्ट्रवादी मित्रों के साथ मिलकर PNB की स्थापना की। इसका उद्देश्य गरीबों को साहूकार और अंग्रेज दोनों के अत्याचारों से मुक्त करवाना था। लाला जी का प्रयोग अत्यंत सफल रहा। शीघ्र ही पूरे पंजाब में PNB की शाखाएं फैल गई। इससे गरीबों को कर्ज के जाल से मुक्ति मिली। लाला जी का संकल्प पूरा हुआ। समाज सुधार के इस सफल उदहारण को न किसी इतिहास की पुस्तक में पढ़ाया जाता, न ही किसी अर्थशास्त्र की पुस्तक में पढ़ाया जाता। इसके दो कारण है। पहला तो वोट बैंक की राजनीति। इस सुधारवादी कदम का बखान करने से वोट नहीं मिलते। दूसरा कम्युनिस्ट मानसिकता वाले साम्यवादी लेखक है। वे गरीबों के हक, शोषण की बात तो करते है परन्तु उसका समाधान कभी नहीं करते। वे केवल अपने राजनितिक हितों को साधने में लगे रहते है। आज तक साम्यवादियों ने ऐसा कोई सामाजिक सुधार किया हो तो बताये।
- जिस PNB बैंक की स्थापना का उद्देश्य समाज सुधार था खेद है कि उस बैंक में आज महाघोटाले होते है।
- फिर भी इतिहास में PNB की स्थापना सामाजिक उत्थान कि एक प्रेरणादायक घटना है। लाला लाजपत राय को उनके इस महान पुरुषार्थ के लिए नमन।
सलंग्न चित्र PNB बैंक लाहौर की प्रथम शाखा का चित्र

समाज सुधार और सेवा
लाला लाजपत राय ने न केवल राजनीतिक मोर्चे पर, बल्कि सामाजिक सुधार में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
- महिला सशक्तिकरण: महिलाओं को शिक्षा और स्वावलंबन के लिए प्रेरित किया।
- जातिवाद का विरोध: उन्होंने जाति-प्रथा और छुआछूत के खिलाफ आंदोलन किया।
- आपदा प्रबंधन: अकाल, सूखा और बाढ़ के समय उन्होंने राहत कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
- युवाओं को राष्ट्र भक्ति का सन्देश देने के लिए उन्होंने अपनी लेखनी द्वारा शिवाजी, स्वामी दयानंद, मेजिनी, गैरीबाल्डी जैसे प्रसिद्ध लोगों की आत्मकथाएं अनुवादित व प्रकाशित कीं । इन्हें पढ़कर अन्य लोगों ने भी स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु संघर्ष की प्रेरणा प्राप्त की ।
- जब वहां सैकड़ों निर्धन, अनाथ, असहाय मात्र इसाई मिशनरियों की दया पर निर्भर थे और वह उन्हें सहायता के बदले अपने धर्म में परिवर्तित कर रहीं थीं तब लाला जी ने अनाथों के लिए एक आन्दोलन चलाया व जबलपुर, बिलासपुर,आदि अनेक जिलों के अनाथ बालकों को बचाया और उन्हें पंजाब में आर्य समाज के अनाथालय में ले आये ।
- उन्होंने कभी भी धन को सेवा से ज्यादा महत्व नहीं दिया और जब उन्हें प्रतीत हुआ की वकालत के साथ-साथ समाज सेवा के लिए अधिक समय नहीं मिल पा रहा है तो उन्होंने अपनी वकालत की प्रेक्टिस कम कर दी ।
- इसी प्रकार 1899 में जब पंजाब, राजस्थान, सेन्ट्रल प्रोविंस, आदि में और भी भयावह अकाल पड़ा और 1905 में कांगड़ा जिले में भूकंप के कारन जन-धन की भारी हानि हुई तब भी लालाजी ने आर्य समाज के कार्यकर्त्ता के रूप में असहायों की तन,मन,धन से सेवा-सहायता की ।
- अकाल, प्लेग, बाढ़ आदि अकाल परिस्थितियों में सेवा करते समय लाला जी ने पाया की ईसाई समाज निर्धन हिन्दुओं की आपातकाल में सेवा इस उद्देश्य से नहीं करता की यह मानवता की सेवा कर रहा हैं बल्कि इसलिए करता हैं ताकि अनाथ हुए बच्चों अथवा निराश्रित हुए परिवारों को सहायता के नाम पर ईसाई बनाया जा सके । लाला जी ने इस अनैतिक कार्य को रोकने का प्रयास किया तो ईसाई मिशनरी ने उन पर कोर्ट में केस तक कर दिया था । लाला जी सत्य कार्य कर रहे थे इसलिए विजयश्री उन्हीं को मिली।
राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव
लाला जी का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं था। उन्होंने अमेरिका में रहकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए समर्थन जुटाया।
- 1917 में उन्होंने अमेरिका में “इंडियन होम रूल लीग” की स्थापना की।
- उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन प्राप्त करने की दिशा में कार्य किया।
मृत्यु और विरासत
जब 30-अक्टूबर-1928 को सायमन कमीशन लाहोर पहुंचा तब वहां उसके विरोध में लाला जी ने मदन मोहन मालवीय जी के साथ शांतिपूर्ण जुलूस निकाला । इसमें भगत सिंह जैसे युवा स्वतंत्रता सेनानी भी शामिल थे । पुलिस ने इस अहिंसक जुलूस पर लाठी चार्ज किया ! इसी लाठीचार्ज में लालाजी को निशाना बनाकर उन पर जानलेवा हमला किया गया जिस से उन्हें घातक आघात लगा और अंतत: 17-नवम्बर-1928 को यह सिंह चिर-निद्रा में सो गये ।
अपनी मृत्यु से पूर्व लाला जी ने भविष्यवाणी की थी की ” मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी अंग्रेज सरकार के ताबूत में अंतिम कील साबित होगी । ” , जो की सच साबित हुई । लाला जी की इस हत्या ने भगत सिंह, आदि क्रांतिकारियों को उद्वेलित कर दिया । अभी तक वह गाँधी जी के अहिंसक आन्दोलन में जी-जान से जुड़े थे किन्तु जब उन्होंने देखा की शांतिपूर्ण विरोध पर भी दुष्ट अंग्रेज सरकार लाला जी जैसे व्यक्ति की हत्या कर सकती है तो उन्होंने इस अन्याय व अत्याचार का बदला लेने की ठान ली और लाला जी के हत्यारे अंग्रेज अधिकारी सौन्ड़ेर्स को मारकर ही दम लिया ।
लाला लाजपत राय की मृत्यु ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नया मोड़ दिया। उनकी शहादत ने देशवासियों में क्रांति और आत्मनिर्भरता की भावना को और मजबूत किया।
- उनकी याद में कई संस्थानों, सड़कों और स्मारकों का नामकरण किया गया है।
- पंजाब विश्वविद्यालय में उनकी प्रतिमा और दिल्ली में “लाजपत नगर” उनके नाम से है।
निष्कर्ष
लाला लाजपत राय भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धा और समाज सुधारक थे। उनका जीवन साहस, सेवा और बलिदान का प्रतीक है। उन्होंने स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उनकी प्रेरणा आज भी भारतीय समाज को दिशा देती है। उनके विचार और कर्म हमें यह सिखाते हैं कि सच्चे नेता बनने के लिए न केवल बलिदान देना पड़ता है, बल्कि अपने देश और समाज के लिए समर्पित होना पड़ता है।
सभार- डॉ. विवेक आर्य










