पूजनीय प्रभो !! हमारे,भाव उज्जल कीजिये

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पूजनीय प्रभो !! हमारे,भाव उज्जल कीजिये

पूजनीय प्रभो !! हमारे,
भाव उज्जल कीजिये
छोड़ देवें छल-कपट को,
मानसिक बल दीजिये

वेद की बोलें ऋचायें,
सत्य को धारण करें
हर्ष में हों मग्न सारे,
शोक-सागर से तरें

अश्वमेधादिक रचायें,
यज्ञ पर-उपकार को
धर्म-मर्यादा चलाकर,
लाभ दें संसार को

नित्य-श्रद्धा भक्ति से,
यज्ञादि हम करते रहें
रोग-पीड़ित विश्व के,
सन्ताप सब हरते रहें

भावना मिट जाय मन से,
पाप अत्याचार की
कामनाएँ पूर्ण होवें,
यज्ञ से नर-नार की

लाभकारी हों हवन,
हर जीवधारी के लिए
वायु-जल सर्वत्र हों,
शुभ गन्ध को धारण किए

स्वार्थ-भाव मिटे हमारा,
प्रेम-पथ विस्तार हो
“इदं न मम” का सार्थक,
प्रत्येक में व्यवहार हो

प्रेम रस में तृप्त होकर
वन्दना हम कर रहे
“नाथ” करुणारूप करुणा
आपकी सब पर रहे

यज्ञरूप प्रभो !! हमारे,
भाव उज्जल कीजिये
छोड़ देवें छल-कपट को,
मानसिक बल दीजिये

रचनाकार :- पण्डित श्री लोकनाथ जी तर्कवाचस्पति / तर्क-शिरोमणि

उल्लेखनीय है की क्रान्तिकारी श्री भगतसिंह जी
का यज्ञोपवीत संस्कार पण्डित लोकनाथ जी
तर्कवाचस्पति ने ही करवाया था और भारत के
प्रथम अन्तरिक्ष यात्री श्री राकेश शर्मा जी
पण्डित लोकनाथ जी के पौत्र हैं |

प्रायः लोग इस भजन / काव्य को यज्ञ के बाद
गाने वाली रचना मानते हैं या यह रूढ हो गयी है
जबकि यह स्वयं में भजन ही है |
यज्ञ के बाद गाये जाने के कारण प्रायः लोग
समझते हैं की इस गीत में यज्ञरूप अग्नि
(भौतिक-आग) की स्तुति है जब कि इस गीत में
ईश्वर की स्तुति है, न की सामने रखे अग्नि-कुण्ड
या यज्ञ-कुण्ड से कुछ माँगा जा रहा है |
इस भजन के रूढ़ हो जाने के कारण भी प्रायः
लोग आक्षेप करते हैं जैसे मूर्तिपूजक जड़ मूर्ति
के सामने हाथ जोड़कर माँगता है वैसे ही
आर्यसमाज वाले या यज्ञ करने वाले अग्नि-कुण्ड या यज्ञ-कुण्ड से माँगते हैं जबकि ऐसा है ही नहीं |

ईश्वर के अनेक गुणवाचक नामों में से एक नाम है “यज्ञ” | (यज देवपूजासंगतिकरणदानेषु) इस धातु से ‘यज्ञ’ शब्द सिद्ध होता है। ‘यज्ञो वै विष्णुः’ यह ब्राह्मण ग्रन्थ का वचन है। ‘यो यजति विद्वद्भिरिज्यते वा स यज्ञः’ जो सब जगत् के पदार्थों को संयुक्त करता और सब विद्वानों का पूज्य है, और ब्रह्मा से लेके सब ऋषि मुनियों का पूज्य था, है और होगा, इससे उस परमात्मा का नाम ‘यज्ञ’ है, क्योंकि वह सर्वत्र व्यापक है।

महर्षि दयानन्द जी ने अपनी विनय पुस्तक “आर्याभिविनय:” के द्वितीय मन्त्र “अग्निमीळे पुरोहितं” में ईश्वर को यज्ञदेव से सम्बोधित किया है | यज्ञ का अर्थ भी परमात्मा होता है और अग्नि का अर्थ भी परमात्मा होता है अतः किसी प्रकार की जड़ पूजा का यहाँ स्थान नहीं है |

सकल विश्व में व्यापक होकर भगवान् ही सब का संयोग या वियोग करता है इसलिए संयोग-वियोग रूप यज्ञतन्तु से बन्धा हुआ सकल जगत् यज्ञमय है | देखें (यजुर्वेद 31/07, ऋग्वेद 1/165/50 |

यदि इस भजन / काव्य रचना में “यज्ञकुण्ड प्रभो हमारे” आदि जैसा कुछ लिखा होता तो आक्षेप करने वाला सही हो जाता लेकिन यज्ञ के सही अर्थ को जान लेने पर सारे भ्रम का निवारण हो जाता है, शंका का समाधान हो जाता है |