सत्याग्रह में सहभागिता
प्रो० किशोरीलाल जी जो २ अगस्त १९५७ को बनारस से श्री रामप्रसाद जी गुप्त मुख्य उपमन्त्री आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तरप्रदेश के प्रथम प्रान्तीय जत्थे में एक सत्याग्रही के ही रूप में सम्मिलित हुये थे और पंजाब से जेल काटने के पश्चात् १० दिसम्बर ५७ को अम्बाला संन्ट्रल जेल से छूटने के पश्चात् बेहोशी की अवस्था में खानखाना पहुँचे। २६ दिसम्बर को उन्हें लुधियाना अस्पताल में प्रविष्ट किया गया और २ जनवरी ५८ को अस्पताल में ही देहान्त हो गया ।
शिक्षा और व्यवसाय
वे बनारस में इन्जीनियरिंग कालेज में प्राध्यापक थे। उनका उस समय मासिक वेतन ३२५) था।
त्यागपत्र और सत्याग्रह का संकल्प
उनके सम्बन्ध में निम्न बातें ऐसी हैं जो भुलाई नहीं जा सकतीं। उन्होंने २ अगस्त ५७ को सत्याग्रही जत्थे में सम्मिलित होने के लिये १५ जुलाई ५७ (१५ दिन पूर्व अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया।
नौकरी समाप्ति और वेतन कटौती
जेल में ही उन्हें कालिज की ओर से नोटिस मिला या तो अपने स्थान पर आकार काम करो अन्यथा नियमानुसार चार मास का वेतन १३००) रु० उनके फण्ड से काट लिया जायेगा। उन्होंने जेल से ही यह सहर्ष उत्तर दे दिया कि “मैं नौकरी नहीं करूंगा आप १३००) रु० मेरे प्राविडेण्ट फण्ड से काट लेवें।
सत्याग्रह और कारावास
२३ अगस्त को उन्होंने चण्डीगढ़ में सत्याग्रह किया और २४ अगस्त से १९ दिसम्बर तक अम्बाला सेण्ट्रल जेल में रहे।
दुर्बलता और असमय निधन
जेल से छूटते समय वे इतने दुर्बल होगये कि अधिक समय तक न जी सके। उनकी आयु उस समय केवल २५ वर्ष ही थी। ये फूल खिलने से पूर्व ही मुरझा गये । युवावस्था के आरम्भ में ही ये संसार से चल बसे।
सेवा और धर्मभाव
वे एक आर्य सत्याग्रही थे जो जेल में ही अन्य साथियों की सेवा करना अपना धर्म समझते थे।
हिन्दी आन्दोलन का समापन
इस प्रकार अनेक वीरों की बलि लेकर हिन्दी आन्दोलन समाप्त हुआ ।










