प्रेम में भरकर उसके गीत गाओ

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प्र सम्राज॑ वृहद॑र्चा गभीरं ब्रह्म प्रियं वरुणाय श्रुताय ।

वि यो ज॒घान॑ शमि॒तेव॒ चर्मो प॒स्तितरै पृथ्विर्वी सूर्याय ।। ऋ. ५.८५.१

तर्ज : पुन्योल तुम्बी पोवाली तुम्बी

आ जाओ तुम भी, आ जाएँ हम भी —
मिलकर प्रभु के गुण गाएँ।
एकत्र होकर प्रेम बढ़ाकर,
भाव समर्पण में हम प ले
पत्ता-पत्ता, अणु-अणु उसकी ,
महिमा को दर्शा रहा
उसकी महिमा का राग सारा
विश्व मिल के गा रहा।

॥ आ जाओ ॥


(१)
थोड़ा सा भी सोचें — एकाग्र होके,
उसकी रचना-कौशल दीखे।
विश्व तो एक ही मण्डली में
प्रभु महिमा गाता फिरे

फिर भी हमें गर सुनाई न दे, क्या फिर दोष नहीं है, इस मनका

॥ आ जाओ ॥


(२)
प्रभु की महिमा का छोटा नमूना है, विस्तार वाली धरती
हर जीव को अन्न-बल देकर कितना उपकार करती।
किन्तु वरुण ने मृगासन जैसे धरती-धरातल बिछाया, गजब किया।

॥ आ जाओ ॥


(३)
ईश्वर की भक्ति में डूबे रहे हम, गुणगान उसका हो विस्तृत
प्रेम के रस में भीगी सी भक्ति, वेद विहित होवे भूषित
अपने हृदय से भी निकली हुई भक्ति, जिसमें हो वेद गायन, हार्दिक्तदा।

॥ आ जाओ ॥


(४)
प्रभुभक्त योगी सूर्य के सम्मुख, करता है ईश-उपासना
योगी है शमिता, सच्चा उपासक दूर ही रखता है वासना
रखता है शाँत मन इन्द्रियों को, सफल है उसकी भक्ति और प्रार्थना

॥ आ जाओ ॥


(५)
ऐ मेरे आत्मा! अपने वरुण की प्रेम भरी भक्ति कर ले
कर ले उपशम सारे संकट हृदय में शमिता को धर ले
विश्व ब्रह्माण्ड के प्यारे सम्राट की करते ही रहना उपासना और साधना

॥ आ जाओ ॥

(शमिता) अपने मन इन्द्रियों को शांत रखने वाला उपासक। (उपशम) शान्त