प्रभुजी मोरा भक्ति में मन रम जाए
भक्ति में मन रम जाए प्रभुजी (2) ॥ प्रभु जी…
चाँदी न माँगूँ सोना ना माँगू, दौलत का अम्बार न माँ
ओ३म् रतन मिल जाए ॥ प्रभु जी…
तेरी कृपा से नरतन पाया, ज्ञान का इसने दीप जलाया
मन उजियारा छाए ॥ प्रभु जी…
ना मैं साधू ना सन्यासी, फिर भी दरस का मैं अभिलाषी
बैठा आस लगाए ॥ प्रभु जी…
ना मैं जानूँ मथुरा काशी, मेरा ईश्वर घट घट वासी
घट में दरस दिखाए ॥ प्रभु जी…
मन को मैं साधू प्रीत डोर बाँधू, लोभ मोह से दूर मैं भागूँ
ओ३म् में चित्त रम जाए ॥ प्रभु जी…
(नरतन) मनुष्यजन (अभिलाषी) इच्छुक (दरस) दर्शन (घटा) हृदय










