परमेश्वर से प्रीत कर मन अपने को जीत कर

0
29

परमेश्वर से प्रीत कर
मन अपने को जीत कर
पर हित पर उपकार में
जीवन को व्यतीत कर
परमेश्वर से प्रीत कर

इस दुनियाँ में सब से ऊँचा
मानव का तन पाया है
जीने वाले साँस तुम्हारे
जीवन का सरमाया है
वक्त रहेगा बीत कर
सोच समझ मनमीत कर
पर हित पर उपकार में
जीवन को व्यतीत कर
परमेश्वर से प्रीत कर
मन अपने को जीत कर
पर हित पर उपकार में
जीवन को व्यतीत कर
परमेश्वर से प्रीत कर

तन को तो मजबूत बनाया
मन क्यों निर्बल तेरा है
बाहर तू ने दीप जलाए
अन्दर घोर अन्धेरा है
बातें न विपरीत कर
मन को न भयभीत कर
पर हित पर उपकार में
जीवन को व्यतीत कर
परमेश्वर से प्रीत कर
मन अपने को जीत कर
पर हित पर उपकार में
जीवन को व्यतीत कर
परमेश्वर से प्रीत कर

जीवन है नदिया की धारा
सुख दु:ख दो किनारे हैं
इसी के अन्दर आते जाते
कितने जन्म गुजारे हैं
वर्तमान संगीत कर
सफल भविष्य अतीत कर
पर हित पर उपकार में
जीवन को व्यतीत कर
परमेश्वर से प्रीत कर
मन अपने को जीत कर
पर हित पर उपकार में
जीवन को व्यतीत कर
परमेश्वर से प्रीत कर

आलस व अज्ञान के कारण
धर्म कर्म सब भूल गया
धन दौलत को सब कुछ समझा
इस झूले पर झूल गया
शुभ-कर्म संग्रहीत कर
मुक्ति “पथिक” निर्णीत कर
पर हित पर उपकार में
जीवन को व्यतीत कर
परमेश्वर से प्रीत कर
मन अपने को जीत कर
पर हित पर उपकार में
जीवन को व्यतीत कर
परमेश्वर से प्रीत कर