(१)
परमपिता की वाणी”धर्मी”
पढी नहीं जब जाती है।
निश्चय जानों सभी जनों में,
चरित्रहीनता आती है।
चरित्रहीनता की दुर्बलता,
जीवन भर खूब सताती है।
जैसा पावे वैसा खावे,
ना कोई उसका साथी है।
(२)
ईश्वर की आज्ञा है ऐसी,
नित्य नमस्ते कीया कर।
इसके तू अतिरिक्त दूसरा,
और नाम मत लीया कर।
इसका उत्तर इसी नाम से,
सभी जनों को दीया कर।
ईश्वर को आधार मानकर,
धर्मी”जग में जिया कर।
(३)
संपत्ति से हीन मनुष्य जो,
मरा हुआ कहलाता है।
राष्ट्र मरा वह कहलाता है,
जिसमें भूप न पता है।
श्राद्ध मरा उसको कहते हैं,
जो श्रद्धा रहित जिमाता है।
बिना दक्षिणा यज्ञ जो होता,
“धर्मी”मरा कहाता है।
(४)
इन छ: बातों वाला”धर्मी”
गुणीं भूप कहलाता है।
समय पड़े पर संधि कर ले,
समय पै युद्ध मचाता है।
अवसर पाकर हमला कर दे,
कभी बैठ चुप जाता है।
बलवानों से बैर करै ना,
छल नीति अपनाता है।










