स नः पप्रिः पारयाति स्वस्ति नावा पुरुहूतः। इन्द्रो विश्वा अति द्विषः
॥ ऋः ८.१६.११
तर्जः मिड़ीतुम्मिल पुणरुम्न नेरम परयादे अरियुम अनुरागम
तरणी लगा प्रभु खेवन
प्रारम्भ किया जब से निदिध्यासन
परिशमित हुए द्वेष
प्रभु का छाया परिवेष
पीये, पीये भर भर अमृत के प्याले॥
॥ तरणी लगा॥
की प्रभु से वन्दना
दी प्रभु ने सान्त्वना
टेर हमारी ले ली पूरी सुन
तरणी शरण की, दे दी प्रभु ने
हुए द्वेष भाव सारे गुम
‘पप्रि’ प्रभु के हो गये हम
सुख-आनन्द में डोले
कुशल-क्षेम में हो आसन्न
प्रभु के बन गए, मन भावन
॥ तरणी लगा॥
मिट गई है तुच्छता
भा गई है सत्यता
पाकर स्नेह तव भगवन्
भर रही है भव्यता
कर्म-कर्मण्यता
हे परमात्मा ! तेरे संग
तुझसे पाया जब ऋत-मन
भर लिए प्रेम के झोले
करते रहे इस तरह प्रसन्न
आत्मा कर दी परिपूरन॥
(तरणी) नाव, नौका। (निदिध्यासन) परमात्मा का सान्निध्य। (परिशमित) पूर्ण शांत। (परिवेष)
चारों ओर से रक्षा करने वाला। (सान्त्वना) प्रेम, प्रणय। (टेर) पुकार। (पत्रि) पूर्ण करने वाले।
(आसन्न) जुड़ा हुआ। (ऋत-मन) नियमों पर चलने वाला मन।










