ओ३म् ग्र॒न्थिं न वि ष्य॑ ग्रथि॒तं पु॑ना॒न ऋ॒जुं च॑ गा॒तुं वृ॑जि॒नं च॑ सोम ।
अत्यो॒ न क्र॑दो॒ हरि॒रा सृ॑जा॒नो मर्यो॑ देव धन्व प॒स्त्या॑वान् ॥
ऋग्वेद 9/97/18
पापों के बन्धन से मुक्ति दो भगवन्
हृदय-गाँठ खोला करो ना !
कट जाएँ पाश तो दर्शन हो तेरे
प्रभु कष्ट दुख क्लेष हरो ना
पापों के बन्धन से मुक्ति दो भगवन्
हृदय-गाँठ खोला करो ना !
खुल जाएँ गाँठें कुटिलता की सब
प्रभु तुझको पाने की करें प्रार्थना जब
‘वृजिन’ कर्म की करें पार ना हद
ऋजु-मार्ग चाहें कभी हम ना खोना
ऋजु-मार्ग-पथिप्रज्ञ बनो ना !
पापों के बन्धन से मुक्ति दो भगवन्
हृदय-गाँठ खोला करो ना !
हर लो कुटिलता दे दो सरलता
सद्ज्ञान दे दो कि पाएँ सफलता
तुम्हीं जानते हो ऋजु-पथ प्रबलता
सत्पथ चलाकर रक्षा करो ना !
प्रभु चाहें तुमको न खोना
पापों के बन्धन से मुक्ति दो भगवन्
हृदय-गाँठ खोला करो ना !
खुल जाएँ गाँठें इक-इक, हृदय की
युक्ति विचारें अघ, दु:ख विलय की
अनमोल जीवन के याज्ञिक समय की
उत्तम, अधम, मध्यम पाश खोलो ना !
सन्तान की लाज रखो ना !
पापों के बन्धन से मुक्ति दो भगवन्
हृदय-गाँठ खोला करो ना !
कट जाएँ पाश तो दर्शन हो तेरे
प्रभु कष्ट दुख क्लेष हरो ना
गांठ खोल’ऐसी याचना ना करके ‘ग्रंथिं न विष्य ग्रंथितम्’ [गांठ की भान्ति बंधे हुए को खोल] कहा है। बंधे को खुलवाने की प्रार्थना सीधी और साफ है। भविष्य में कई प्रकार के बंधन ग्रंथियां=पाश होते हैं। सभी खुलने चाहिए–‘उदुत्तमं मुमुग्धि नो वि पावन मध्यमंचृत’। अवाधमानि जीवसे।। ऋ॰१.२५.२१=हे भगवन्! हमारे उत्तम पास को खोल मध्यम को काट और जीने के लिए अधम पापों को भी काट। पाश तभी कटते हैं जब भगवान के दर्शन हो जाएं।
भिद्यते हृदय ग्रन्थिश्च्छिद्यन्ते सर्वसंशया।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्
दृष्टे परावरे।।
हृदय की गांठ खुल जाती है, संशय छिन्न- भिन्न हो जाते हैं, बंधनहेतु कर्म शिथिल पड़ जाते हैं, जब उस परावर के दर्शन होते हैं।
गांठ खुलने के साथ सुमार्गज्ञान भी चाहिए। इसलिए कहा–‘ऋजुं च गातुं वृजिनं च’=ऋजु और वृजिन मार्ग को भी खोल। दोनों का भेद बता, ताकि हम वृजिन छोड़कर ऋजु मार्ग पर चल सकें। भगवान को ऋजु मार्ग ही प्यारा है, जैसा कि अथर्ववेद [८/४/१२] में कहा है–तयोर्यत।सत्यंयतरवृजीयस्तवित्सोमो अवति हन्त्यासत्।।
उन दो में जो सत्य और जौन सा ऋजु होता है, भगवान उसकी रक्षा करता है और मिथ्या को सर्वथा मार देता है।
भगवान से प्रार्थना है कि जिस प्रकार घर- बार वाला मनुष्य शीघ्रता करता हुआ, चिल्लाता हुआ, अपनी संतान को बचाने के लिए दौड़ता है,प्रभु ! तू भी हमें वैसे ही बचा।










