जन्म और प्रारंभिक जीवन–पांडुरंग सदाशिवराव खानखोजे का जन्म 7 नवम्बर 1884 को महाराष्ट्र के नागपुर में हुआ। वे बचपन से ही देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत थे। Bal Gangadhar Tilak की प्रेरणा से उन्होंने शस्त्र निर्माण और युद्धविद्या की शिक्षा लेने का निश्चय किया।
विदेश यात्रा और सैन्य शिक्षा–देश की स्वतंत्रता के उद्देश्य से वे चीन, जापान और बाद में अमेरिका गये। सन् 1908 में वे सैन फ्रांसिस्को पहुँचे। वहाँ सैन्य अकादमी में प्रवेश पाने के लिए उन्होंने प्रारम्भ में खानसामा के रूप में भी कार्य किया। बाद में वे नियमित छात्र बने और दो वर्ष तक सैन्य शिक्षा प्राप्त की। इसके पश्चात वे पोर्टलैंड चले गये।
🔹 सन् 1910 में पोर्टलैंड में उनकी भेंट Sohan Singh Bhakna और पंडित काशीराम से हुई। मिलकर उन्होंने ‘भारतीय स्वाधीनता संघ’ की स्थापना की, जो आगे चलकर Ghadar Party के रूप में प्रसिद्ध हुआ।‘ग़दर’ नामक पत्रिका का प्रकाशन भी आरम्भ किया गया, जो विदेशों में रह रहे भारतीयों में क्रांति की चेतना जगाने का कार्य करती थी।
🔹 ग़दर पार्टी में दायित्व– ग़दर पार्टी के अध्यक्ष सोहनसिंह भकना, मंत्री Lala Har Dayal और कोषाध्यक्ष पंडित काशीराम बने।खानखोजे को पार्टी के ‘प्रहार विभाग’ का प्रमुख बनाया गया। उनका कार्य शस्त्रास्त्र जुटाना, बम निर्माण और युद्ध की तैयारी करना था।उनके सहयोगियों में Vishnu Ganesh Pingle, केदारनाथ और हरनामसिंह आदि शामिल थे।
🔹 विदेशी भूमि पर संघर्ष–खानखोजे को भारत भेजने की योजना बनी। वे यूनान के पिरेदुस बन्दरगाह पहुँचे। आगे चलकर वे तुर्की गए और वहाँ के नेताओं Enver Pasha तथा Talaat Pasha से मिलकर भारत की स्वतंत्रता हेतु सैनिक सहायता प्राप्त की।ईरान की सीमा पर अंग्रेजी सेना से उनकी मुठभेड़ हुई। वे घायल अवस्था में पकड़े गए, परंतु साहसपूर्वक कैद से भाग निकले। बाद में ईरान की सेना में शामिल होकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े।
🔹 लोकमान्य तिलक से भेंट –सन् 1919 में वे भारत लौटे और पुणे जाकर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से मार्गदर्शन लिया। तिलक ने उन्हें रूस जाकर कार्य करने की सलाह दी।
🔹 मैक्सिको में प्रोफेसर जीवन– परिस्थितियों के कारण वे जर्मनी और फिर मास्को गये, परंतु सफलता नहीं मिली। अंततः वे मैक्सिको पहुँचे, जहाँ उन्होंने कृषि विज्ञान पढ़ाना प्रारंभ किया।उन्होंने मिनेसोटा विश्वविद्यालय से कृषि विज्ञान में शोध कर ‘डॉक्टर’ की उपाधि प्राप्त की।
🔹 भारत वापसी और सम्मान– सन् 1949 में वे पत्नी और दो बच्चों सहित भारत लौटे।भारत सरकार ने उनके कृषि ज्ञान और योगदान को देखते हुए उन्हें ‘कृषि पंडित’ की उपाधि से सम्मानित किया।
🔹 निधन– सन् 1967 में इस महान क्रांतिकारी का स्वर्गवास हुआ। जिस स्वतंत्रता के लिए उन्होंने अपना यौवन अर्पित किया था, उसका अनुभव वे अपने जीवनकाल में कर सके।










