पण्डित श्यामलाल जी

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🌟 पण्डित श्यामलाल जी का जीवन परिचय

हैदराबाद राज्य के अमर धर्मवीर जिनके नाम मात्र से विधर्मी डरा करते थे


धर्मवीर पण्डित श्यामलाल जी का जन्म दिसम्बर 1903 ई० में हैदराबाद राज्यान्तर्गत बीदर जिले के भालकी नामक ग्राम में हुआ था। पिता का नाम भोलाप्रसाद (भोलानाथ) और माता का नाम छट्टोबाई था। जन्मना आप ब्राह्मण थे। वे पांच भाई बहिन थे। दो बहिनें बड़ी और एक छोटी थी। उनमें से एक बड़ी तथा एक छोटी का देहावसान हो चुका है। एक बड़े भाई और एक बड़ी बहन अवशिष्ट हैं। बड़े भाई प्रसिद्ध पण्डित बन्शीलाल जी हैं जो हैदराबाद के एक माननीय नेता हैं।

2.हुमनाबाद मुसलमानों का गढ़ है। वहां पठान अधिक संख्या में बसते हैं। हिन्दुओं पर अत्याचार भी बहुत होते हैं। श्यामलाल जी ने वहां सन् १९२५ में शिवरात्रि का पर्व वैदिक ढंग से मनाया। होली का पहली बार नगर कीर्तन भी निकाला दोनों कार्य स्थानीय जनता ने खूब पसन्द किये। १९२६ में आर्यसमाज उदगीर की स्थापना की तथा भरी सभा में आजीवन वैदिक धर्म का प्रचार करने की प्रतिज्ञा की।

3.४ अप्रैल १६३१ को “आर्य प्रतिनिधि सभा हैदराबाद राज्य” की स्थापना हुई। दो वर्ष पश्चात् श्री श्यामलालजी प्रतिनिधि सभा के मन्त्री बने। उसी वर्ष कोहोर में होली के पर्व पर एक शुद्धि हुई तथा एक जलूस निकाला। यवनों ने घोर विरोध किया। परन्तु पण्डितजी निर्भयता के साथ मुसलमानों की भीड़ चीरते हुए जलूस निकाल ले गये।

१६३३ में आर्यसमाज हलमीखेड़ का वार्षिकोत्सव मनाने का यत्न किया गया। समय पर आज्ञा न मिलने से उस वर्ष वर्षा ऋतु में उत्सव मनाया गया। इस अवसर पर शास्त्रार्थ महारथी पंडित रामचन्द्र जी देहलवी पधारे थे। इसी उत्सव के भाषणों पर आपत्ति उठाकर पं० रामचन्द्रजी तथा स्थानीय कार्यकत्र्ताओं पर वह प्रसिद्ध अभियोग चलाया गया जिससे हैदराबाद में आर्यसमाज तथा राज्य के बीच संघर्ष का सूत्रपात हुआ ।

अब प्रतिनिधि सभा का कार्य खूब बढ़ गया था। स्टेट में समाजें भी बढ़ गई थीं। अब तक कार्यालय का कार्य अकेले पंडित जी चला रहे थे। अब क्लर्क भी रख लिये गए। इस वर्ष जहां पंडित रामचन्द्र जी देहलवी के मुकदमे की घूम थी वहां आर्यसमाज मंदिर निलंगा को गिराने का शोर मचा हुआ था। इन्हीं दिनों दिनदार सिद्दीकी हिन्दुओं के विरुद्ध खुले आम प्रचार कर रहा था। श्यामलालजी ने स्थान स्थान पर मुंहतोड़ उत्तर देकर उसे परास्त किया। इसी वर्ष आर्यसमाज के वार्षिकोत्सव ‘पर प्रतिबन्ध लग गया। इन कठिनाइयों को दूर करने के लिए पहले अखिल भारतीय आर्य महा-सम्मेलन के मनाने की, पश्चात् निजाम स्टेट आर्य सम्मेलन के मनाने की आज्ञा मांगी गई, परन्तु वह न मिली। इन कठिनाइयों तथा प्रचार के प्रतिबन्धों को दूर करने के लिये महात्मा नारायण स्वामी जी तथा आचार्य रामदेव जी हैदराबाद पधारे। उन्होंने खूब प्रचार भी किया ।

1.राज्य के विभिन्न मेलों पर भी श्यामलाल जी प्रचारार्थ जाया करते थे। प्रतिवर्ष के अनुसार १९३५ में माणिक नगर के मेले पर प्रचारार्थ गये। आर्यों का नगर-कीर्तन निकल रहा था, मुसलमानों ने उस पर हमला कर दिया। एक व्यक्ति ने छुरे से भाई श्यामलाल जी पर भी भयानक वार किया, परन्तु एक युवक ने उन्हें बचा लिया। युवक को गहरा जख्म लगा। बन्शीलाल जी उस समय हल्लीखेड़ में थे। पुलिस ने अपनी योग्यता का परिचय देते हुए उल्टा ही न्याय किया। श्री श्यामलाल जी, वन्शीलाल जी. दत्तात्रय प्रसाद जी तथा नरेन्द्र जी पर उसने केस चलाया। अन्त में श्यामलाल तथा बन्शीलाल जी पर ५०) जुर्माने का दण्ड मिला।

2.एक बार अधिवेशन में उनका भाषण रक्खा गया। उसके दो दिन पूर्व ही अचानक आंख का आपरेशन हुआ। नेत्र में भयंकर पीड़ा थी। साथ में ज्वर चढ़ा हुआ था। पास कोई सेवक न था। ऐसी परिस्थिति में भी उन्होंने अधिवेशन में जाकर भाषण दिया। इसी लगन के कारण वे प्रतिबन्धों, विघ्नों और रुकावटों के होते हुए भी थोड़े समय में इतना अधिक कार्य कर सके ।

3.अन्त में विपत्ति का विषम वज्रपात लिये १९३७ का दशहरा आ गया। उदगीर के आयों के विशेष आग्रह पर श्यामलाल जी उदगीर गये। श्री बन्शीलाल जी सार्वदेशिक सभा के अन्तरंग अधिवेशन में सम्लिलित होने के लिये दिल्ली गये हुये थे। दशहरे पर दंगा होगया तथा गंगाराम नामो लिङ्गायत द्वारा एक मुसलमान मारा गया। पुलिस ने पंडित श्यामलाल जी को पकड़ा , बीदर की जेल में डाल दिया। इस कारागार से वे जीवित शरीर से बाहर न आ सके ।

शोलापुर में उन दिनों अखिल भारतीय आर्य महासम्मेलन की तैयारियां हो रही थीं। आर्यनगर में शव के पहुँचते ही हलचल मच गई। उनका शरीर कङ्काल मात्र रह गया था। शोलापुर के डॉक्टर श्री नीलकण्ठ राब एल० एम० एस०, के० एल० ओ० (वियाना) ने शव की परीक्षा करने के बाद लिखा था कि “पेट सिकुड़ कर पीठ से जा लगा था। हाथ के नाखून काले पड़ गए थे। दाई टांग के गिट्टे के पास आघ इन्च घेरे का एक घाव पाया गया। दाईं टाँग पर भी एक लम्बा घाव था।” कुछ और घावों का भी डॉक्टर जी ने उल्लेख किया था यह निःसन्देह बात है कि उनकी मौत जेल की नृशंस यंत्रणाओं और कठोर अत्याचारों के कारण हुई। बड़ी शान के साथ उनका दाह संस्कार वैदिक रीति से किया गया ।

1.एक घटना और है आर्यसमाज का प्रारम्भिक काल था और तब उनका ही घर आर्यसमाजी था। उदगीर में पहली बार हिन्दुओं की होली का जलूस निकालने के कारण मुसलमान बेतरह बिगड़ गये। उन्होंने मकान पर आक्रमण की सूचना दी। पण्डित जी ने घर के १०-१२ युवकों को छत पर बैठा दिया। आप सड़क के पास जो घर का बरामदा था उसमें टहलने लगे। आधी रात के समय मुसलमान सड़क पर जमा होकर हल्ला करने तथा दीन दीन का नारा लगाने लगे। पण्डित जी को भी बहुत भला बुरा कहते रहे। वे पूर्ववत् शांति से पिस्तौल लिये टहलते रहे। अन्त में कुछ देर बाद जब दीन दीन के नारे के उत्तर में छत पर बैठे युवकों ने भी “वैदिक धर्म की जय” का नारा बुलन्द किया तो मुसलमान भाग गये।

2.पण्डित जी के कार्य तथा उनके द्वारा हिन्दुओं में उत्पन्न होती हुई जागृति को देखकर सर्वप्रथम उदगीर के तहसीलदार मोहम्मद जान के कान खड़े हुए। उसने स्थानीय मुसलमानों को भड़का कर पंडित जी के मकान पर आक्रमण भी करवाया। परन्तु वे ऐसो बातों से धैर्यच्युत नहीं हुये। उन्होंने समाज स्थापना के बाद प्रथम वर्ष उदगीर में दशहरा का जलूस निकाला। तहसीलदार ने झूठी रिपोर्ट कर के जलूस रोकना चाहा। परन्तु उसका प्रयत्न निष्फल गया। इस समय से वे रक्षार्थ सशस्त्र रहने लगे । उसी वर्ष होली के जलूस में दो मुसलमानों ने पण्डित जी पर छुरे से आक्रमण किया परन्तु ईश्वर ने रक्षा की। उसी दिन एक मुसलमान ने बारूद जलाकर हाथ पर एक छोटा सा घाव कर लिया तथा प्रसिद्धि की कि श्यामलाल ने रिवाल्वर चलाकर उसे घायल किया है। उस रात्रि को यवन सैकड़ों की संख्या में एकत्र होकर उनके घर पर चढ़ आये। वे पहले से ही कमर कसकर तैयार थे। जब उनके घर से सम्बन्धी युवकों के जयघोष की ध्वनि निकली तो मुसलमान भाग खड़े हुए। इसके बाद उनके गृह पर अनेक इश्तिहार लगाये गए। इससे पण्डित जी का उत्साह दूना होता गया। जनता का भी आर्यसमाज में प्रेम और विश्वास बढ़ता गया।

१९२८ में उदगीर आर्यसमाज का प्रथम वार्षिकोत्सव मनाया गया। पण्डित मङ्गलदेवजी का भाषण हुआ था। इस उत्सव के उपरान्त पुलिस पण्डितजी के हाथ धोकर पीछे पड़ गई। उसी वर्ष उन पर १०४ घारा के अधीन एक झूठा केस चलाया गया। पुलिस सफल हुई। पण्डितजी से दो हजार की जमानत व दो हजार का मुचलका लिया गया। अपील में हाईकोर्ट से वे निर्दोष सिद्ध हुए। इस मुकदमे में उस समय के न्यायाधीश ने लिखा है- “इस शख्स का खलल दिमाग मजहवी मालूम होता है मगर इस मर्ज की दवा दफा (१०४) जाब्ते फौजदारी नहीं हो सकती और न इसके इलाज के लिए यह दफा बजा किया गया है।” इस मुकदमे में पुलिस ने यह अभियोग लगाया था कि श्यामलाल सशस्त्र रहते हैं, व्यायाम करते हैं तथा व्याख्यान देते हैं। परन्तु योग्य न्यायाधीश ने अपने निर्णय में लिखा कि-“आजादी तकरीर पर रियासत की रियाया का एक फितरी हक है।”

हैदराबाद जैसी रियासत में प्रचार का केवल एक यही उपाय था और इसी के सहारे प्रचार हुआ। श्यामलाल जी निजाम स्टेट में प्रचार का मार्ग साफ कर गये हैं। परमात्मा की ऐसी कृपा हो कि घर घर में उनसा पुत्र उत्पन्न हो और वैदिक धर्म का प्रचार हो।

पण्डित श्यामलाल जी का जीवन धैर्य, संघर्ष, त्याग और सत्य के प्रचार की अनुपम मिसाल है। वे आज भी वैदिक धर्म के प्रचारकों और आर्य समाजियों के लिए प्रेरणा के शिखर पुरुष हैं।