पंडित रुचिराम

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” दु:ख और बीमारी से तडफ-तडफ कर मरने से अच्छा है कि किसी उत्तम कार्य को करके मरना चाहिये। क्या तुम अरब में जाकर यह पता लगा सकते हो कि हम किस प्रकार वहाँ वैदिक धर्म का प्रचार कर सकते हैं ? “
श्री स्वामी स्वतंत्रतानन्द जी ने दयानन्दोपदेशक विद्यालय , गुरुदत्त भवन , लाहौर , में पंडित रुचिराम आर्योपदेशक से कहा। दूसरे ही दिन 29 अप्रिल सन 1929 को पंडित जी लाहौर से अरब के लिये पैदल ही निकल पड़े। पूरे सात वर्षों तक समस्त अरब मुल्कों में विभिन्न जगहों के शेख सुल्तानो की अनुमति से उन्होंने मक्का मदीना से लेकर हर जगह ओम का झंडा गाड़ा। सुल्तान जलाला तल मलिक अब्दुल अजीज इब्न सऊद जो मक्का के हाकिम भी थे के व्यक्तिगत मेहमान भी रहे।इन्हीं सुल्तान ने मदीना की जन्नतलबाकी की सारी कब्रें जो मुहम्मद की बीबियों, बेटी फातिमा और सहाबाओं की थीं तुड़वाकर समतल करवा दीं और अब कोई यहां कब्रों की इबादत नहीं कर सकता है। मक्का में भी यही किया। इन्हीं के वंशज आज सऊदी अरेबिया के सुल्तान हैं। इब्न सऊद ने वेद की शिक्षाओं को सुनकर अनेक सुधार भी किये। खुद अपनी लम्बी दाढी भी कटवा दी ।

पंडित जी ने सात वर्ष बाद लौटकर अपने यात्रा संस्मरणों और अनुभवों पर एक पुस्तक भी लिखी । इसे पढकर यह पता चलता है कि अगर आज भी अरब मुल्कों में वेद प्रचार की छूट मिल जाये तो मुश्किल नहीं है वहाँ के निवासियों को इस्लाम की गिरफ्त से बाहर करना । शायद यही एक वजह है कि वहाँ इस्लाम को एक बंद कमरे में रख दिया गया है । हालांकि 1938 में अमेरिका द्वारा तेल की खोज के बाद अरब में सम्पन्नता बेतहाशा बढ गयी है और साथ ही लोग ज्यादा कट्टर भी हो गये हैं लेकिन फिर भी यह कार्य मुश्किल नहीं है। निम्न लेख में लेखक के कुछ चुनिंदा अनुभवों को देने का प्रयास किया गया है ताकि सही तस्वीर उभर कर सामने आये।

1- मस्कत से पैदल आगे बढने पर गांव में बद्दू (देहाती अरबी) मिले। पुरूषों ने पूछा , तुम कहां से आये हो और कहाँ जाओगे ?”
” भारतवर्ष से आया हुं और मक्का जाऊंगा।”
फिर एक बद्दू महिला ने पूछा , “क्या तुम्हारा निकाह हो गया है ?”
“हाँ मेरा निकाह हो गया है।”
“उसको तलाक दे दो”
“क्यों?”
“यह लडकी बहुत सुंदर है और तुम्हें चाहती है। हम वो लडकी तुम्हें दे देंगे।”
” मैं तो वैदिक धर्म का प्रचार कर रहा हूँ।ऐसा होना असम्भव है।”
” तो फिर तुम्हारी कमीज के बटन बहुत अच्छे हैं वो दे दो।”

मैंने कमीज के बटन तोडकर उन्हें दे दिये और साथ में कुछ बिस्कुट और एक गोल शीशा भी । जब एक बद्दू महिला ने शीशे में खुद को देखा तो हंस कर बोली खुदा की कसम इसमें तो लोग हैं।फिर छीना झपटी शुरु हो गयी।बद्दू शीशे में देखकर हंसी से लोटपोट हो रहे थे। बोले तुम तो जादूगर हो।कोई बोलता मेरी ऊंटनी के लिये ताबीज लिख दो वो दो दिन से कुछ नही खाती।कोई कहता हमारी बकरियों के लिये ताबीज लिख दो क्योंकि भेडिये आते हैं और इनको उठा ले जाते हैं।तो कोई ताबीज से जिन्न भूतों वश में करना चाहता था। मेरा ताबीजों में यकीन तो था नहीं फिर भी मैने कागज पर गायत्री मंत्र लिखकर ताबीजें दे दीं। सब बहुत खुश हुये।मुझे वली-ए-अल्लाह बोलने लगे। ऐसे ही लोगों को आसानी से मुहम्मद ने बेवकूफ बनाकर इस्लाम में शामिल कर लिया होगा।
बद्दुओं ने मुझे सदैव अपने पास रूकने को कहा कि हमारे साथ बकरियां और ऊंट चराइये , खाने को खजूर और पीने को उंटनी का दूध देंगे। साथ में दो शादियां भी करवा देंगे।परंतु यह सब कैसे हो सकता था।

2- यहाँ से पांच दिन का पैदल सफर तय कर रियाज पहुंचा।सुल्तान इब्न ए सऊद मोटर पर बैठ सैर को जा रहे थे।मुझे अपरिचित देख रूक गये।मैंने नमस्ते की तो उन्होंने भी नमस्ते कहकर उत्तर दिया।फिर गुलाम के साथ शाही महल भेजा और अगले दिन दरबार बुलाया। दूसरे दिन मैं दरबार पहुंचा तो सुल्तान ने हाथ उठाया और सारी सभा खडी हो गयी। जबतक मैं नहीं बैठा सब खड़े रहे। यही नियम अरब की सभी सभाओं में पालन किया जाता है। सबके बैठने पर मैंने वेदमंत्र सुनाये। वहां सभा में मिश्र का एक डाक्टर सिगरेट पी रहा था। मैंने सभा में उसे रोककर इसके अवगुण बताये। सुल्तान ने भी कहा कि उसके वहाबी मत में यह मना है लेकिन दूसरे मत वाले पीते हैं। सुल्तान ने तभी आदेश निकालकर सबके लिये यह अगले दिन से निषेध कर दिया। सभा में एक तलाक का विषय आया तो सुल्तान मेंरी राय पूछी। मैने इस मुद्दे पर वैदिक राय रखी तो सुल्तान को बहुत पसंद आयी और बोले , हमें दु:ख है कि ऐसी बुरी प्रथा चल पड़ी है और अकारण तलाक हो रहे हैं। कुछ दिनों के मेरे प्रचार का यह असर पड़ा कि सुल्तान ने अपनी दाढी पर उस्तरा फिरवा दिया और ठोड़ी पर बस थोड़े से ही बाल रहने दिये। यथा राजा तथा प्रजा। बहुत भारतीय मुसलमानों ने भी अपनी दाढी मुड़वाकर अरबी सूरत बना दी। आज मैंने एक विवाह और गुलामों को आजाद करने की भी पैरवी की तो फिर एक दिन सुल्तान ने गुलामों को आजाद करने का आदेश दे दिया। फिर सुल्तान ने मुझे नजद ओ हजाज , मक्का और मदीना में भी प्रचार करने की आज्ञा दे दी और पंद्रह दिन बाद अपने साथ मोटर से चलने का आग्रह भी किया। लेकिन चूंकि मुझे पैदल ही जाना था तो मैंने सुल्तान से विदा मांगी और मक्का चल पड़ा।

3- मेरा एक उपदेश नजदो हज्जाज में बद्दू लोगों के अन्याय के खिलाफ था। जबसे इस्लाम चला है हज करने मुसलमान अरब जाते हैं। हाजियों को लूटना और गोली मारना बद्दुओ का पेशा था।जद्दा और तायफ के आसपास की सारी भूमि हाजियों के खून से रंगी पड़ी है। सुल्तान से पहले मक्का पर तुर्कों का शासन था और बद्दुओं को मुहम्मद के ननिहाल वाला समझकर कुछ नहीं बोला जाता था। मेरे कहने पर सुल्तान ने बद्दुओं की इस हरकत को फौज लगाकर हरदम के लिये शांत कर दिया।

4-मक्का के रास्ते में बीस दिन बाद फिर दवादमी में सुल्तान से भेंट हुयी और उनके साथ मै मोटर से शायेरा होते हुये सेल पहुंचा।यहां से मक्का समीप है। रात भर यहीं रुककर सुबह उठकर सबके साथ मैंने भी एहराम बांधा क्योंकि मक्का की सीमा यहीं से शुरू होती है और बिना एहराम बांधे जाना धर्मसंगत नहीं है।जो भारतीय मुसलमान जहाज से मक्का पहुंचते हैं उन्हें जहाज में बैठे ही यमन मे लिमलिम पहाड़ी पर ऐहराम बांधना पड़ता है।एहराम दो सफेद धोतियों का नाम है जो बिना सिले कपड़े की होती है। एक बांध ली जाती है और दूसरी ओढ़ ली जाती है। सर नंगा रहता है। इब्राहीम के मुकाम होता हुआ मैं खाना ए काबा भी पहुंच गया।

5- मक्का से तीन मील दूर तायफ है जहां गायें मिलती हैं और महंगी होती हैं। कोई अरबी इन्हें कुरबानी के लिये नहीं बेचना चाहता क्योंकि वह इस बात को अच्छी तरह जानता है कि गाय का दूध मक्का में नहीं मिलता।इसलिये वह इसे बचाना और पालना अपना धर्म समझता है। यहाँ से साठ मील दूर दूर तक घास नहीं है इसलिये गायें भी कम मिलती हैं।

6-हज के दिनों में जहाँ कुरबानी होती है वहाँ भेड़ बकरियां ही दिखाई देती हैं। चूंकि मक्का में केवल जुलाब लगाने वाला सनाय का पौधा ही होता है बकरियां यही खाती हैं। इन कुरबान की हुयी बकरियों का गोश्त खाने से हाजियों के पेट चल जाते हैं और वो बहिश्त पहुंच जाते हैं। इस वजह से सिर्फ मीना में अस्सी हाजी रोज मरते हैं जिन्हें दफन करने के लिये कब्र भी नहीं मिलती । मैने सुल्तान से इस समस्या के बारे में कहा तो उसने कुरबानी का गोश्त खाने पर लिखित प्रतिबंध लगा दिया और कुरबानी के मांस को वहीं जमीन में गाड़ने का हुक्म दे दिया। किसी गैर अरबी मुसलमान ने चूं चपड़ तक नहीं की । अरबी जनता खुश हुयी पर गैर अरबी डर के मारे चुप रहे ।

7- ओम का झंडा मक्का की गली गली कूंचे कूंचे और हर बादशाह के दरबार में मेरे साथ लहराता था । सफा मरवाह में मैंने अन्य हाजियों की तरह सात दौड़ें लगाई । उस समय भी यह झंडा मेरे साथ था। यह ओम का झंडा जबल अरफात में जहाँ हज होता है वहाँ भी गाड़ा गया। ऐसे ही मुजदिलफा , मीना , बेतुल्लाह यानी खुदा का घर या खाना-ए-काबा में भी यह मेरे साथ था और इसके चारों ओर सात तवाफ अर्थात परिक्रमा में भी यही साथ लहराया। मक्का के जन्नतमाले ओर मदीना की जन्नतल बाकी में भी यह लहराया। इसलिये यह व्यवस्था इस्लाम की अर्थहीन है कि काबा में काफिर न जाये। कौन जाये कौन ना जाये यह एक व्यक्ति की व्यवस्था हो सकती है ईश्वर की नही।

8- सारे मक्का में सूडानी औरतें रात दिन सर पर पानी के घड़े रखे हुये आवाज लगाती हैं ‘हाजी मोया अरबा कुरोश’ यानी ऐ हाजी लोगों , मोया यानी पानी का एक टिन चार आने में ले लो। हाजी मोया सुनकर हिंदुस्तानी मुसलमान पूछते हैं “कौन मरा है?” औरते यह समझकर कि पूछ रहे हैं कि क्या भाव दिया है जवाब में चार उंगलियां दिखाकर कहती हैं , “अरबाकुरोश” जिसका मतलब है ‘चार आने में’। इधर मुसलमान समझते हैं कि चार हाजी मर गये हैं और पूछते हैं कि “कौन कौन मरा है?” आज भी यही हाल है सभी भारतीय मुसलमानों का। वो अरबी नहीं जानते लेकिन जिद फिर भी है कि कुरान अरबी में ही रटो।

9- तायफ एक माह वैदिक धर्म का प्रचार करने के बाद सुल्तान से विदा ली और पैदल चलता बाईस दिनों में यमन की सीमा के नजदीक पहुंचा।यहां के देहाती अरबियों के बीच प्रथा देखी कि अपने रसोईघर को ये गोबर से लीपते हैं और अपने सर पर गाय के खुर के बराबर शिखा भी रखते हैं। पूछने पर पता चला कि ये सब अरब में किसी समय हिंदू आर्य ही थे और फिर धर्मच्युत हो गये। इधर भारत से भी अनेक शताब्दियों तक कोई धर्म उपदेशक उनके बीच धर्म प्रचार को नहीं गया क्योंकि यहां यह वेद विरुध्द व्यवस्था दे दी गयी थी कि समुद्र पार करने से व्यक्ति धर्म से पतित हो जाता है। ऐसी ही दशा यमन में भी दिखाई दी।बस हिदुस्तानी मुसलमान अरबियों की शिखा देखकर आपस में भुनभुनाते रहते हैं पर हिम्मत नहीं की उन अरबियों को टोकें।

10- ओम का झंडा लिये मैं लाल सागर तट के बंदरगाह यमबा पहुंचा। संयोग से बाजार में बनारस के अट्ठारह जुलाहे बाजार में मिल गये। जब उन्होने एक अरबी बालक को शिखा रखे देखा तो पूछा क्या यह हिंदू है। मैंने कहा यहां के बद्दुओं का यही रिवाज है वो सर पर चोटी रखते हैं। सुनते ही वो तौबा तौबा कहने लगे और सोचा मैने ही अरबियों में चोटी का प्रचार किया है । चोटी के खिलाफ वो लगातार उर्दू में बोलते रहे लेकिन अरबी इन्हें घास नहीं डालते ।

11- अरब के बद्दुओं को तो जमजम कूयें का भी कुछ पता नही है और जो मक्का के आस पास रहते हैं वो हज भी नहीं करते। एक बार मैने एक अरब निवासी से अरबी में पूछा , “क्या जमजम अच्छा है?” उसने जवाब दिया , ” जमजम आदमी तो अच्छा है।” मैंने कहा भाई जमजम कोई आदमी नहीं है बल्कि यह तो मक्का का अच्छा खासा पवित्र कूआं है , उसने हैरान होकर उत्तर दिया , ” जमजम उस समय तो आदमी था अब कूआं हो गया नहीं पता।” इसपर हम सब खूब हंसे।

12- मिश्र मे प्रचार के दौरान मैंने दाढी के खिलाफ कुछ लिखा , तो बस फिर ऐसी हवा चली कि वहाँ के बड़े बड़े लोगो ने भी दाढी के खिलाफ लिखा ।इसका फल यह हुआ कि अब वहाँ दाढी कोई नहीं रखता।इस मामले में मिश्र तुर्की की बहन बन गयी है।यदि कोई भी दाढी वाला बाजार से गुजरता है तो उसपर लोग चिल्लाते हैं और बच्चे ताली पीट पीट कर पीछे पड़कर चिढ़ाते हैं कि ” सुनया मुनया या इहलक…सुनया मुनया या इहलक।” अर्थात दाढ़ी कटवा दो दाढ़ी कटवा दो। और फिर गालियों से खबर ली जाती है। हिंदुस्तानी मुसलमानों का तो गजब तमाशा बन जाता है बाजार में और अनेक फौरन दाढ़ी कटवा भी देते हैं।

13- अदन , यमन , से मोकल्ला बंदरगाह नाव से पहुंचा और आगे पैदल ही बढा । रेगिस्तान में कई दिन बाद बद्दुओं के गांव दिखे । वो मुझे अपने गांव ले गये जहाँ मैंने उन्हें वेद की शिक्षा दी जो उन्होंने चाव से सुनी। तभी वहां एक मौलवी आया ऊंट पर सवार होकर और उनसे कहा कल से रमजान शुरू होने वाला है , दिन में कुछ ना खाना।फिर “लाहौलबिला” बोल कर चल दिया।
बाद में बद्दुओं ने मुझसे पूछा कि –
“कल क्या बला आने वाली है जो हमें दिन के समय खाने ना देगी और किस दिशा से आयेगी ?”
ये तो मैं जानता ही था कि इन्हें नमाज, रोजा और कुरान का कुछ नही पता इसलिये कह दिया कि –
“वह बला कल शाम को पश्चिम की ओर से आयेगी।”
दूसरे दिन बद्दू सुबह बकरी चराने निकले और शाम को उन्हें एक ऊंटनी और उसका बच्चा पश्चिम से आते दिखाई दिये।उन्होंने समझा यही बला है जिसका जिक्र मौलवी ने किया था तो उन्होंने उस ऊंटनी को मार डाला।जब “रमजान” मर गयी तो “लाहौल” की तलाश हुई।उन्होंने ऊंटनी के बच्चे को “लाहौल” समझकर मार डाला और खुशी खुशी घर लौट आये।
शाम जब हम फिर साथ बैठे थे तो वो ही मौलवी फिर आये और कहा कि-
” आज रात भर पेट खा लो , कल सुबह तुम्हें खाने को कुछ नही मिलेगा।आज चांद दिखाई दे गया है और कल से रमजान है।”
सुनकर बद्दू बोले कि-
“हमने रमजान को मार दिया है।”
मौलवी झट से बोला ,”लाहौलबिला।”
“हमने लाहौलबिला को भी मार दिया”,बद्दुओं ने खुशी खुशी जवाब दिया।
मौलवी साहेब सकपकाते हुये खिसक लिये और मैं हंसता रहा।

14- फिलिस्तीन में भी मुझे वैदिक धर्म के प्रचार की अनुमति मिल गयी। लैलातलमेराज के दिन बैतुलमुकद्दस में कौनफेरेंस थी। मौलाना शौकत अली और इकबाल भी आये थे और अरबिक में एक पंक्ति भी ना बोल पाने के कारण वो दोनों श्रोताओं के हो हल्ले के चलते बैठा दिये गये।अरबी अखबार भी मजाक उड़ाते हुये यही लिखते थे अलहिन्दी आये हैं जिससे सर इकबाल तो इतना अपमानित महसूस किये कि यहीं से लौटने के बाद उन्होंने दु:खी होकर ” सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा” नज्म बनाई । ये बात अलग है कि वो पाकिस्तान चले गये और नज्म ही बदल डाली। इन्हीं मौलाना और उनके साथियों से एक बार अरब के लोगों ने कहा – ‘यल्लाह’ , यानी चलिये। मौलाना ने झट कहा “अल्लाह” यानी ‘हे ईश्वर’। पंद्रह मिनट तक यही चलता रहा और मौलाना कुछ समझ ना पाये।

15 – मिश्र में भी मुझे प्रचार की छूट मिल गयी। यहां की विश्वप्रसिध्द ‘ जामिया अल जहर ‘ यूनिवर्सिटी में देवबन्द से छात्र अरबिक पढने आते हैं। उस समय ऐसे बाइस छात्र थे। ये अरबिक भी नहीं बोल पाते थे। सबसे अलग थलग अपने समूह में ही रहते थे। इन्हें लोग ‘ अलहनूद’ और ‘अलहिंद’ कहकर चिढाते। मन मसोस कर रह जाने के अलावा ये और कुछ कर भी नही सकते और ऐसे में इन्हें भारत याद आता है।

16- मसकट से अदन की ओर नाव से जाते समय समुद्र के किनारे एक पहाड़ी पर एक भारी मूर्ति नाव में बैठे अरबियो ने मुझे दिखाई। वो इसे ‘ सनम-अल-बनयान यानी हिंदुओं की मूर्ति कहते हैं। कुछ समय बाद इस रास्ते से गुजरते हुये मैं इस मूर्ति के पास ठहरा था जो कम से कम एक हजार साल पुरानी है।इस्लाम के प्रचार के पूर्व यहां हिंदू बसे हुये थे।महाभारत के युध्द के बाद विद्वानों और योगियों के मारे जाने से वेदों का प्रचार विदेशों में रुक गया और इसलिये लोग अपना मूल धर्म भूलकर मुसलमान हो गये।

15 फरवरी सन 1936 को पंडित जी वापस हिंदुस्तान लौट आये और 17 मार्च सन 1937 को पहाड़तली , चिटगांव , बांगलादेश , में यह पुस्तक लिखकर समाप्त की।

अरब में मेरे सात साल पुस्तक से साभार।