पंडित रामचन्द्र देहलवी

0
25

रामचन्द्र देहलवी (8 अप्रैल 1881 – 2 फरवरी 1968) आर्यसमाज के अत्यन्त विद्वान, प्रखर वक्ता और प्रसिद्ध शास्त्रार्थकार थे। वे वैदिक धर्म के सिद्धान्तों के साथ-साथ इस्लाम और ईसाई मत के ग्रन्थों के भी गहरे ज्ञाता थे। इन मतों के ग्रन्थों का उन्होंने गहन अध्ययन किया और उनकी मान्यताओं की तथ्यपूर्ण तथा प्रभावशाली समीक्षा की। अपने तर्क, विद्वता और निर्भीक शैली के कारण वे पूरे आर्यजगत में अत्यन्त सम्मानित और विश्वसनीय विद्वान माने जाते थे।

जन्म एवं परिवार–पंडित रामचन्द्र देहलवी का जन्म 8 अप्रैल 1881 को चैत्र शुक्ल नवमी, संवत् 1938 विक्रमी को मध्यप्रदेश के नीमच में हुआ था।उनके पिता का नाम मुंशी छोटेलाल तथा माता का नाम श्रीमती रामदेई था।रामनवमी के पावन दिन जन्म होने के कारण उनका नाम रामचन्द्र रखा गया।शिक्षाबाल्यकाल से ही उनकी बुद्धि अत्यन्त कुशाग्र थी। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा नीमच के विद्यालय में हुई।मिडिल (आठवीं) की परीक्षा – डी.ए.वी. स्कूल, अजमेर से उत्तीर्णआगे की शिक्षा – इन्दौर मेंमैट्रिक परीक्षा – प्रथम श्रेणी में उत्तीर्णउन्होंने औपचारिक शिक्षा मैट्रिक तक ही प्राप्त की, परन्तु स्वाध्याय के द्वारा वे असाधारण विद्वान बन गए।

विवाह एवं पारिवारिक जीवन– 18 वर्ष की आयु में उनका विवाह दिल्ली निवासी कमलादेवी से हुआ। विवाह के बाद वे दिल्ली आ गये। अब परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी उन पर आ गई।दिल्ली में उनके श्वसुर की सुनार की दुकान थी, जो पारिवारिक व्यवसाय था। इसी समय उन्होंने रैली ब्रदर्स नामक एक अंग्रेजी फर्म में 15 रुपये मासिक वेतन पर नौकरी की।

नौकरी छोड़ने की घटना –एक बार अवकाश लेने पर फर्म के ईसाई मालिक ने आपत्ति जताई। तब देहलवी जी ने उत्तर दिया कि बाइबिल के अनुसार ईश्वर ने सृष्टि बनाने के बाद सातवें दिन विश्राम किया था, जो एक प्रकार का अवकाश ही है।इस स्पष्ट और निर्भीक उत्तर के कारण उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी।

इसके बाद उन्होंने अपने श्वसुर की दुकान पर स्वर्णकारी (सुनार) का कार्य प्रारम्भ कर दिया और इस कार्य में भी उन्हें सफलता व लोकप्रियता प्राप्त हुई।

पत्नी का निधन और आजीवन ब्रह्मचर्य का संकल्प–सन् 1917 में जब उनकी आयु 36 वर्ष थी, तब उनकी धर्मपत्नी कमलादेवी का निधन हो गया। उन्हें पुनः विवाह के अनेक प्रस्ताव मिले, परन्तु उन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया।उन्होंने अपनी पत्नी के पार्थिव शरीर के सामने यह संकल्प लिया—

“जिस दृष्टि से मैंने तुम्हें देखा है, उस दृष्टि से अब किसी अन्य स्त्री को नहीं देखूँगा।”

इसके बाद उन्होंने अपना अधिकांश जीवन वैदिक साहित्य के अध्ययन और प्रचार में समर्पित कर दिया।

वैदिक धर्म के प्रचार की प्रेरणा–उन दिनों दिल्ली के फव्वारा चौक पर ईसाई पादरी और मुस्लिम मौलवी सप्ताह में दो दिन अपने-अपने मत का प्रचार करते थे और वैदिक धर्म की आलोचना करते थे।पंडित रामचन्द्र देहलवी इन व्याख्यानों को सुनते थे। वैदिक धर्म की आलोचना सुनकर उन्हें अत्यन्त दुःख होता था। इसी पीड़ा ने उन्हें इन मतों के ग्रन्थों का गहन अध्ययन करने और उनके भ्रमों का उत्तर देने के लिए प्रेरित किया।उन्होंने इस्लाम और ईसाई मत का गहरा अध्ययन किया और फिर उसी स्थान पर प्रतिदिन वैदिक धर्म का प्रचार तथा उन आलोचनाओं का खण्डन आरम्भ कर दिया।

चौदह वर्षों तक निरन्तर व्याख्यान–देहलवी जी के व्याख्यान इतने लोकप्रिय हुए कि फव्वारा चौक पर भीड़ बढ़ने लगी और यातायात में बाधा आने लगी। तब पुलिस ने उनके व्याख्यानों के लिए निकटवर्ती गांधी ग्राउण्ड निर्धारित कर दिया।सन् 1910 से 1924 तक लगभग 14 वर्षों तक उन्होंने वहाँ निरन्तर व्याख्यान दिए।इतने लंबे समय तक लगातार सार्वजनिक व्याख्यान देना अपने आप में एक अद्भुत उदाहरण था।इसी अवधि में उनकी पत्नी और एक पुत्र का निधन भी हुआ, परन्तु उन्होंने अपने धर्मकार्य में कोई बाधा नहीं आने दी।

कुरान का अध्ययन और शास्त्रार्थ

पंडित देहलवी ने कुरान का अध्ययन एक अपंग हाफिज को अपना गुरु बनाकर किया। उनसे विधिवत कुरान पढ़कर उन्होंने इस्लाम के ग्रन्थों का गहन ज्ञान प्राप्त किया।इसके बाद उन्होंने पादरियों और मौलवियों से अनेक शास्त्रार्थ किये और अधिकांश में विजय प्राप्त की। उनकी तर्कशक्ति, शास्त्रज्ञान और प्रभावशाली वक्तृत्व से विरोधी भी प्रभावित हो जाते थे।देशव्यापी ख्यातिउनकी विद्वता का डंका पूरे आर्यजगत में बजने लगा। देशभर की आर्यसमाजों में उन्हें वैदिक धर्म के प्रचार के लिए आमंत्रित किया जाता था।वे ऋषि दयानन्द के आदर्श भक्त थे और मनसा-वाचा-कर्मणा वेद प्रचार में समर्पित थे।

हैदराबाद में प्रतिबन्ध–हैदराबाद मुस्लिम रियासत में वैदिक धर्म के प्रचार से बड़ी धार्मिक जागृति उत्पन्न हुई। पंडित देहलवी के प्रभावशाली व्याख्यानों से घबराकर वहाँ के निजाम ने उनके रियासत में व्याख्यान देने पर प्रतिबन्ध लगा दिया और उन्हें वहाँ से निष्कासित भी कर दिया।

निधन –2 फरवरी 1968 को 87 वर्ष की आयु में दिल्ली में उनका निधन हुआ। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन वैदिक धर्म के प्रचार और सत्य के प्रतिपादन में समर्पित कर दिया।

प्रमुख ग्रन्थ पंडित रामचन्द्र देहलवी ने आर्यसमाज के साहित्यिक भण्डार को अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों से समृद्ध किया।

उनके प्रमुख ग्रन्थ हैं—

दो सनातन सत्तायें

सत्यार्थप्रकाश के चतुर्दश समुल्लास में उद्धृत कुरान की आयतों का देवनागरी में उल्था और अनुवाद (1945)

ईश्वर सिद्धि

ईश्वरोपासना

धर्म और अधर्म

ईश्वर में अविश्वास क्यों?

विद्यार्थी और सदाचार

ईश्वर की पूजा का वैदिक स्वरूप

इंजील के परस्पर विरोधी वचन

पौराणिकों से शास्त्रार्थ का विषय निश्चित करते समय ध्यान रखने योग्य बातें

कुरान में अन्य मतावलम्बियों के लिए कठोर वाक्यों का संग्रह (1944)

आर्यसमाज की मान्यतायें

आर्यसमाज के मन्तव्य

कुरान का अनुवाद (सूरह फातिहा और सूरह बकर)रामचन्द्र देहलवी लेखावली (1968)

ईश्वर ने दुनिया क्यों बनाई?

पूजा क्या, क्यों और कैसे?

वेद का इस्लाम पर प्रभाव

उन पर लिखी गई पुस्तक

आर्यजगत के प्रसिद्ध विद्वान राजेन्द्र जिज्ञासु ने“पं. रामचन्द्र देहलवी व उनका वैदिक दर्शन” नामक 367 पृष्ठों का महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखा है।इसका प्रकाशन 2008 में दिल्ली के विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द प्रकाशन से हुआ। इस पुस्तक में उनके जीवन, विचारों और ग्रन्थों का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।