पंडित लेखराम:

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पंडित लेखराम

धर्म प्रचार : वैदिक संस्कृति की पुनर्स्थापना का आह्वान

पंडित लेखराम जी आर्य समाज के एक महान विचारक, लेखक और समाज सुधारक थे। उनका जीवन और लेखन पूरी तरह वैदिक धर्म के प्रचार और उसकी रक्षा को समर्पित था। उन्होंने न केवल धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाई, बल्कि समाज को जागरूक करने के लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए। उनका यह लेख हमें वैदिक धर्म की महानता, उसके पतन के कारण और पुनरुद्धार के उपायों पर विस्तृत जानकारी देता है।


प्राचीन भारत और वैदिक संस्कृति

भारत एक ऐसा देश रहा है, जहाँ धर्म और आध्यात्मिकता का केंद्रबिंदु वेद रहे हैं। हज़ारों वर्ष पूर्व, जब पूरी दुनिया अज्ञान और अंधकार में थी, तब भारत में वैदिक संस्कृति का प्रकाश फैला हुआ था। उस समय समाज सत्य, अहिंसा, संयम और ज्ञान के मार्ग पर चलकर उन्नति कर रहा था।

सनातन संस्कृति का स्वर्ण युग

🔹 वैदिक काल में न कोई जात-पात थी, न कोई ऊँच-नीच। समाज चार वर्णों में विभाजित था, लेकिन यह जन्म आधारित नहीं बल्कि कर्म आधारित था।
🔹 स्त्रियों को शिक्षा और सम्मान प्राप्त था। ऋषिकाएँ वेदों का अध्ययन करती थीं।
🔹 राजा प्रजा के सेवक होते थे, न कि शासक। वे धर्म और न्याय के आधार पर शासन करते थे।
🔹 यज्ञ, ध्यान, ब्रह्मचर्य और सत्कर्मों को जीवन का आधार माना जाता था।

लेकिन समय के साथ जब लोगों ने वेदों की शिक्षाओं को छोड़ दिया और स्वार्थ, लालच, वासना, और कुरीतियों में फंस गए, तब भारतीय समाज कमजोर होने लगा। इसी कारण, विभिन्न मत और पंथ अस्तित्व में आए।


धर्म का पतन और बौद्ध-जैन मत का प्रभाव

2500 वर्ष पूर्व, जब समाज में कर्मकांड बढ़ गए और लोग वेदों से विमुख हो गए, तब गौतम बुद्ध ने एक नया मत चलाया, जिसे बौद्ध धर्म कहा गया।

बौद्ध और जैन मत के कारण वैदिक धर्म की हानि

अहिंसा की अतिशयोक्ति – बौद्ध धर्म और जैन धर्म ने अहिंसा पर इतना जोर दिया कि समाज में रक्षा और प्रतिकार की भावना समाप्त हो गई।
संन्यास की प्रवृत्ति – गृहस्थ जीवन की उपेक्षा होने लगी, जिससे समाज कमजोर हुआ।
राजाओं का बौद्ध मत ग्रहण करना – अशोक और कनिष्क जैसे राजाओं ने बौद्ध धर्म अपनाया, जिससे भारत में वैदिक धर्म का प्रभाव कम हो गया।

इसका परिणाम यह हुआ कि भारत की शक्ति क्षीण हो गई और विदेशी आक्रमणकारियों के लिए यह एक आसान लक्ष्य बन गया।


शंकराचार्य जी का पुनरुद्धार अभियान

जब भारत पूरी तरह बौद्ध धर्म के प्रभाव में था और वैदिक धर्म का अस्तित्व संकट में था, तब आदि शंकराचार्य जी ने इस स्थिति को बदलने का संकल्प लिया। उन्होंने देशभर में घूम-घूमकर शास्त्रार्थ किए और बौद्ध धर्म के अनुयायियों को पुनः वैदिक धर्म की ओर मोड़ा।

उनके अभियान की विशेषताएँ

🔹 शास्त्रार्थ के नियम – जो हारता, उसे वैदिक धर्म अपनाना पड़ता था।
🔹 चारों दिशाओं में पीठों की स्थापना – भारत को पुनः वेदों के मार्ग पर लाने के लिए उन्होंने चार पीठों की स्थापना की।
🔹 बौद्ध मठों का परिवर्तन – उन्होंने बौद्ध मठों को पुनः वैदिक शिक्षण संस्थान बना दिया।

शंकराचार्य जी के प्रयासों से भारत में एक बार फिर वैदिक धर्म का प्रकाश फैलने लगा


मुस्लिम आक्रमण और धर्मांतरण

महमूद गजनवी का आक्रमण और सोमनाथ का पतन

1000 ईस्वी के आसपास, जब भारत में मुस्लिम आक्रमण शुरू हुआ, तब हिन्दू समाज पहले से ही कमजोर हो चुका था। महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर को लूटा और हजारों हिन्दुओं का बलात् धर्म परिवर्तन करवाया।

📌 उस युद्ध में 15 लाख हिन्दू सैनिक थे, लेकिन वे 15 हजार मुस्लिम आक्रमणकारियों से हार गए
📌 इसका कारण – धर्म से विमुखता, ब्रह्मचर्य का पतन और समाज में संगठन की कमी

औरंगजेब और धर्मांतरण की नीति

मुगल काल में जबरन धर्म परिवर्तन अपने चरम पर था। औरंगजेब ने हिन्दुओं को इस्लाम कबूल करने के लिए क्रूरतापूर्वक दबाव डाला।

🔹 काशी और मथुरा के मंदिर तोड़ दिए गए।
🔹 गुरुओं और साधुओं की हत्या कर दी गई।
🔹 जज़िया कर लगाया गया, जिससे हिन्दुओं पर आर्थिक बोझ पड़ा।

लेकिन इन अत्याचारों के विरुद्ध गुरु गोविंद सिंह जी, शिवाजी महाराज, और महाराणा प्रताप जैसे वीरों ने प्रतिरोध किया और हिन्दू धर्म की रक्षा की।


ईसाई मिशनरियों का षड्यंत्र

आज भी ईसाई मिशनरी गरीब और अशिक्षित हिन्दुओं को लालच देकर धर्म परिवर्तन करवा रहे हैं

📌 केरल, तमिलनाडु और झारखंड जैसे राज्यों में लाखों हिन्दू ईसाई बनाए जा चुके हैं।
📌 ईसाई संगठन स्कूलों और अस्पतालों के माध्यम से प्रचार कर रहे हैं।
📌 धार्मिक भ्रम और प्रलोभन देकर हिन्दू धर्म को कमजोर किया जा रहा है।


धर्म रक्षा के लिए आवश्यक उपाय

आज भी हिन्दू समाज को जागरूक होना बहुत आवश्यक है। हमें चाहिए कि –

गर्व से अपने धर्म को अपनाएँ – हमें अपने वैदिक धर्म पर गर्व करना चाहिए और उसकी शिक्षाओं का पालन करना चाहिए।
धर्मांतरण रोकें – यदि कोई हिन्दू किसी अन्य धर्म में जा रहा है, तो उसे समझाकर वापस लाएँ।
आर्य समाज और धर्म संगठनों का सहयोग करें – धर्म प्रचार और शुद्धि आंदोलन को बल दें।
युवा पीढ़ी को शिक्षित करें – वैदिक धर्म का प्रचार करें, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी इसे समझ सके।


निष्कर्ष

पंडित लेखराम जी का यह लेख हमें धर्म की रक्षा और प्रचार की महत्ता को समझाता है। यदि हम वैदिक संस्कृति को नहीं बचाएँगे, तो आने वाले वर्षों में हम अपनी जड़ों से कट जाएंगे।

🚩 “धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो!” 🚩