- जन्म एवं परिवार–
वेदों के तलस्पर्शी विद्वान, पाणिनीय व्याकरण के अद्वितीय आचार्य तथा संस्कृत-जगत के गौरव राष्ट्रीय पण्डित पं० ब्रह्मदत्त ‘जिज्ञासु’ का जन्म 14 अक्टूबर 1882 को पंजाब के जालन्धर जिले के मल्लूपोटा (बंगा) ग्राम में हुआ।
उनका मूल नाम लब्भूराम था, परन्तु बाद में उनके गुरु ने उन्हें “ब्रह्मदत्त” नाम प्रदान किया।
उनके पिता का नाम रणदास सारस्वत पाठक (रामदास) तथा माता का नाम श्रीमती परमेश्वरी देवी था। जब वे केवल नौ वर्ष के थे, तभी उनके माता-पिता का देहान्त हो गया। इस प्रकार उनका बाल्यकाल अत्यन्त संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में व्यतीत हुआ।

- शिक्षा के प्रति अद्भुत जिज्ञासा
अनाथ होने के बावजूद उनकी ज्ञान-पिपासा अत्यन्त प्रबल थी। आर्य समाज के एक सज्जन की सहायता से उन्होंने लगभग दसवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की।
परन्तु उनका लक्ष्य केवल सामान्य शिक्षा प्राप्त करना नहीं था, बल्कि वे संस्कृत, वेद और व्याकरण के गूढ़ रहस्यों को समझना चाहते थे।
सन् 1912 में उन्होंने गृहत्याग कर दिया और संपूर्ण जीवन को विद्या और वैदिक धर्म के प्रचार के लिए समर्पित कर दिया। - गुरु स्वामी पूर्णानन्द से व्याकरण अध्ययन
उन्होंने महान व्याकरणाचार्य स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती के सान्निध्य में पाणिनि की अष्टाध्यायी का गम्भीर अध्ययन किया।
स्वामी पूर्णानन्द के निर्देशन में उन्होंने अष्टाध्यायी,महाभाष्य,व्याकरण शास्त्र का गहन अभ्यास किया और शीघ्र ही व्याकरण के प्रकाण्ड विद्वान बन गये। - वैदिक साहित्य का अध्ययन
व्याकरण में पारंगत होने के बाद उन्होंने काशी में रहकर वेदांग,उपांग
,मीमांसा,निरुक्त,दर्शन का भी गंभीर अध्ययन किया। इसी काल में उनकी विद्वत्ता दूर-दूर तक प्रसिद्ध होने लगी। - साधु आश्रम में अध्यापन
सन् 1920 में उन्होंने स्वामी सर्वदानन्द द्वारा स्थापित साधु आश्रम (पुलकाली नदी, अलीगढ़) में छात्रों को पढ़ाना प्रारम्भ किया।
उनके साथ काशी के दो विद्वान—
पं० शंकरदेव
पं० बुद्धदेव
भी अध्यापन कार्य में सहयोग करने लगे।
सन् 1921 में यह आश्रम अमृतसर के निकट मजीठा रोड पर गण्डासिंहवाला ग्राम में स्थानान्तरित हुआ और “विरजानन्द आश्रम” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। - शुद्धि आन्दोलन में भाग
सन् 1923–24 में आगरा शुद्धि सभा के नेतृत्व में मलकाना मुसलमानों की शुद्धि का व्यापक आन्दोलन चलाया गया।
इस आन्दोलन में पं० ब्रह्मदत्त जिज्ञासु, पं० बुद्धदेव तथा आश्रम के कुछ वरिष्ठ विद्यार्थियों ने सक्रिय भाग लिया और वैदिक धर्म के प्रचार का महान कार्य किया।

- काशी और लाहौर में विद्वत् जीवन
कुछ समय बाद आश्रम की व्यवस्थाओं में मतभेद उत्पन्न हो गए, जिसके कारण जिज्ञासु जी ने अमृतसर छोड़कर काशी जाने का निर्णय लिया।
वे लगभग 10–12 विद्यार्थियों के साथ काशी पहुँचे और वहाँ पुनः अध्यापन प्रारम्भ किया।
सन् 1932 में उन्होंने महामहोपाध्याय पं० चिन्नस्वामी शास्त्री से मीमांसा दर्शन का विशेष अध्ययन किया।
इसके बाद सन् 1935 में वे लाहौर चले गये और वहाँ रावी नदी के तट पर शहादरे में विद्यार्थियों को अष्टाध्यायी, महाभाष्य, निरुक्त, वेद ,दर्शन का अध्यापन कराने लगे।
- देश विभाजन के बाद काशी में पुनः स्थापना
1947 में देश विभाजन के बाद वे पुनः काशी (वाराणसी) आ गये।
यहाँ उन्होंने अपने आश्रम को पुनर्गठित कर “पाणिनि महाविद्यालय” के रूप में स्थापित किया। यहाँ पाणिनीय व्याकरण और वैदिक साहित्य का उच्च स्तर पर अध्ययन कराया जाने लगा।
9. पाणिनि कन्या गुरुकुल की स्थापना

पं० ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान काशी में “पाणिनि कन्या गुरुकुल” की स्थापना है।उस समय संस्कृत और व्याकरण की उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम थी। जिज्ञासु जी ने इस स्थिति को बदलने का प्रयास किया और बालिकाओं के लिए व्याकरण अध्ययन का विशिष्ट गुरुकुल स्थापित किया।इस गुरुकुल मेंपाणिनीय व्याकरणवेदनिरुक्तदर्शनका अध्ययन कराया जाने लगा।आज भी यह गुरुकुल संस्कृत व्याकरण के क्षेत्र में अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है और अनेक विदुषी छात्राएँ यहाँ से शिक्षित होकर संस्कृत-जगत की सेवा कर रही हैं।
10. अद्भुत अध्यापन पद्धति–
जिज्ञासु जी की शिक्षण पद्धति अत्यन्त सरल और प्रभावशाली थी।काशी के पण्डितों में यह प्रसिद्ध था कि वे कठिन से कठिन अष्टाध्यायी के सूत्र भी अत्यन्त सरलता से समझा देते थे।लोग मजाक में कहते थे कि उन्होंने कोई देवी सिद्ध कर रखी है। इस पर वे हँसकर कहा करते थे—
मेरी देवी कोई काल्पनिक देवी नहीं है, मेरी देवी है ‘अष्टाध्यायी’। उसी के क्रम से मैं कठिन विषय भी सरल बना देता हूँ।”
11. राष्ट्रीय सम्मान–उनकी महान विद्वत्ता और संस्कृत-सेवा के कारण भारत के राष्ट्रपति ने उन्हें संस्कृत विद्वान के रूप में सम्मानित किया।इसके साथ उन्हें प्रतिवर्ष डेढ़ हजार रुपये की सम्मान राशि भी प्रदान की जाती थी।इस प्रकार वे “राष्ट्रीय पण्डित” के रूप में प्रसिद्ध हुए।
मुख्य ग्रन्थ और रचनाएँ
1. यजुर्वेद भाष्य विवरण महर्षि दयानन्द कृत यजुर्वेद भाष्य के प्रथम 15 अध्यायों पर विस्तृत विवरण।
2. वेदार्थ प्रक्रिया के मूलभूत सिद्धान्त (1945)
3. वेद और निरुक्त (1932)
4. निरुक्तकार और वेद में इतिहास (1945)
5. देवापि और शन्तनु के वैदिक आख्यान का वास्तविक स्वरूप
6. अष्टाध्यायी भाष्य (तीन भागों में)
7. संस्कृत पठन-पाठन की अनुभूत सरलतम विधि (1955)
8. अन्य ग्रन्थभारत के समस्त रोगों की अचूक औषधि – ऋषि प्रणाली (1959) संध्योपासना वेद सम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण
12. देहावसान–
वेद, व्याकरण और वैदिक साहित्य की सेवा करते हुए 22 दिसम्बर 1964 को प्रातः लगभग 2 बजे काशी (वाराणसी) में उनका देहावसान हो गया।










