पण्डित बस्तीराम जी

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पण्डित बस्तीराम जी का जीवनचरित्र
(आर्य समाज के अप्रतिम प्रचारक एवं भजनोपदेशक)


  1. जन्म और बाल्यकाल

पंडित बस्तीराम जी का जन्म संवत् 1868 (सन् 1811 ई.) में पंजाब के रोहतक ज़िले की झज्जर तहसील के ग्राम सुलतानपुर खेड़ी में एक धार्मिक ब्राह्मण परिवार में हुआ। आपके पिता संस्कृत के अच्छे विद्वान थे तथा माता भी धार्मिक स्वभाव की थीं। बचपन से ही आपके संस्कार वेद-पुराणों की परंपरा में पड़े।

आपने देवनागरी लिपि से प्रारंभिक अध्ययन आरंभ किया और कालांतर में संस्कृत का गहन अध्ययन किया। वे ब्राह्मणों की सामान्य यज्ञ प्रक्रिया सीखकर पुरोहिती भी करने लगे। सत्यनारायण कथा एवं पुराणों के वाचन से यजमानों में विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त की। साथ ही, आपको गाने और कविता का शौक भी था। मूर्तिपूजा और पौराणिक कर्मकाण्डों में गहरी आस्था थी और उनका प्रचार भी किया करते थे।


  1. महर्षि दयानन्द के दर्शन और वैदिक धर्म की ओर झुकाव

महर्षि दयानन्द सरस्वती उस समय भारतभर में वैदिक धर्म के प्रचार में संलग्न थे। पंडित बस्तीराम जी ने एक दिन महर्षि द्वारा प्रकाशित विज्ञापन-पत्र पढ़ा, जिसमें मूर्तिपूजा, गंगा-स्नान, पुराणादि को वेदविरुद्ध बताया गया था। यह पढ़ते ही उनके भीतर वैचारिक हलचल मची और वे महर्षि से शास्त्रार्थ की भावना लिए हरिद्वार में भीमगोडा पहुँचे, जहाँ ऋषि ठहरे हुए थे।

परन्तु दो-चार प्रश्नों के उत्तरों से ही वे महर्षि की अद्भुत विद्वत्ता से अत्यंत प्रभावित हो गए और शास्त्रार्थ करने की भावना त्याग दी। 15-16 दिनों तक महर्षि के साथ रहकर अनेक शंकाओं का समाधान किया। इस भेंट के बाद वे पौराणिक बस्तीराम से बदलकर आर्य बस्तीराम हो गए।


  1. पारिवारिक बहिष्कार और त्याग

जब वे घर लौटे और आर्य सिद्धांतों का प्रचार आरंभ किया तो उनके पुराने यजमान और पौराणिक मित्र उनसे विमुख हो गए। उन्हें बहिष्कृत किया गया, परंतु वे विचलित न हुए। उन्होंने परिवार और पारंपरिक जीवन का त्याग कर दिया और आर्य समाज द्वारा निर्दिष्ट वैदिक धर्म के प्रचार में संलग्न हो गए।


  1. प्रचार और संगीत द्वारा जागरण

पंडित बस्तीराम जी ने हरियाणा के गाँव-गाँव में भ्रमण कर वैदिक धर्म का प्रचार किया। उन्होंने एक भजन मण्डली बनाई, जिसके माध्यम से वे गीतों, भजनों और तर्कों से जनमानस को प्रेरित करते। उनकी वाणी में ओज था और उनका एकतारा समस्त श्रोताओं को एक तार में बाँध देता था। उनके गीत आज भी हरियाणा के घरों में गाए जाते हैं।


  1. साहित्य सृजन

पंडित जी ने प्रचार के साथ-साथ अनेक भजनों और वैदिक विषयों पर पुस्तकों की रचना की। उनके प्रमुख ग्रंथ हैं:

  1. पोप की नाखर
  2. पाखण्ड खण्डनी
  3. अघमर्षण प्रार्थना
  4. भजन मोरंजनी
  5. भजन अग्निबाण
  6. महर्षि दयानन्द जीवनकथा (काशी शास्त्रार्थ)
  7. असली अमृतगीता (दो भाग)
  8. अमृत कला
  9. बस्तीराम रहस्य
  10. गऊ भजन संग्रह

इन रचनाओं में उनकी वैदिक निष्ठा, तर्कशक्ति और भक्तिपूर्ण भावना का समन्वय मिलता है।


  1. सामाजिक योगदान

पंडित जी ने हरियाणा के हजारों परिवारों को यज्ञोपवीत देकर आर्य समाजी बनाया। उन्होंने अनेक विद्यार्थियों को गुरुकुलों में भेजा और शिक्षा का प्रचार किया। उन्होंने न कभी किसी संस्था से वेतन लिया, न प्रचार को धन के लिए साधन बनाया। उनकी दक्षिणा गुरुकुल भैसवाल को समर्पित होती थी।


  1. सहयोगी एवं संगठनों के साथ कार्य

अपने जीवनकाल में उन्होंने स्वामी श्रद्धानन्द, पंडित लेखराम, स्वामी स्वतन्त्रानन्द, भक्त फूलसिंह वानप्रस्थ आदि महान आर्य नेताओं के साथ प्रचार कार्य में सहयोग किया। वे किसी पार्टी के पिछलग्गू नहीं बने, अपितु एक स्वतंत्र और दृढ़ वैदिक प्रचारक बने रहे।


  1. जीवन का अंतिम चरण और देहावसान

पंडित जी अपनी आयु के चालीसवें वर्ष में चेचक के कारण अंधे हो गए, फिर भी प्रचार कार्य नहीं छोड़ा। वे जीवन पर्यन्त गाँव-गाँव में घूमकर वेद का प्रचार करते रहे।

26 अगस्त 1958 (श्रावण शुक्ला द्वादशी, संवत् 2015 वि., मंगलवार) को झज्जर तहसील के ग्राम बराणी में ठाकुर हरफूल सिंह के निवास स्थान पर, सूर्योदय के समय, 117 वर्ष की दीर्घ आयु में उनका स्वर्गवास हो गया।


उपसंहार

पंडित बस्तीराम जी वैदिक धर्म के एक ऐसे निर्भीक योद्धा थे, जिन्होंने अंधविश्वासों और पाखंडों का सामना कर समाज में सत्य की ज्योति प्रज्वलित की। उनका जीवन त्याग, तपस्या और सत्य-प्रेम का आदर्श है। आर्य समाज के इतिहास में उनका नाम सदा अमर रहेगा।

हम इस महान आत्मा को कोटिशः प्रणाम करते हैं।