पं० बंशीलाल व्यास

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जन्म एवं परिवार

श्री पं० बंशीलाल जी व्यास का जन्म नागोर (राजस्थान) से चार मिल पर स्थित नराधना नामक एक छोटे से ग्राम में, २ नवम्बर १८९९ ई० दीपावली के दिन रिजकुल में हुआ था। आपके पिता का नाम चतुर्भुज ग्यास तथा माता का नाम जानकी बाई था।


हैदराबाद आगमन और आर्यसमाज से जुड़ाव

धाप व्यापार करने की दृष्टि से दक्षिण हैदराबाद चले गये। वहां उन दिनों आर्यसमाज का व्यापक प्रचार स्व० भाई बंशीलाल जी, स्व० भाई श्यामलाल जी वकील तथा चन्दूलाल जी यार्य आदि किया करते थे।
इसी बीच आर्यजगत् के प्रसिद्ध विद्वानों का उपदेश श्री व्यास जी को सुनने का अवसर मिला, जिसमें शास्त्रार्थ महारथी श्री पं० रामचन्द्र जी देहलवी, पं० बुद्धदेव जी विद्यालङ्कार तथा पं० मंगलदेव जी शास्त्री आदि उल्लेखनीय हैं।
बस उसी दिन से व्यास जी आर्यसमाज और ऋषि दयानन्द के अनन्य भक्त बन गये।


गुरुकुल की स्थापना

आर्यसमाज का कार्य करते-करते आपने देश में कर्मठ विद्वान् बनाने के हेतु १९३८ ई० में अनन्तगिरि में गुरुकुल की स्थापना की। वहां के जलवायु की प्रतिकूलता के कारण अपने जीवन के चार वर्ष वहां बिताने के बाद, यह गुरुकुल सन् १९४१ ई० में घटकेश्वर ग्राम के समीप श्री रामगोपाल राठी द्वारा दिये गये उद्यान में स्थित एक कोठी में स्थानान्तर किया गया, जहां वह अब विद्यमान है।


हैदराबाद आर्य सत्याग्रह में योगदान

सन् १९३८-६० के हैदराबाद आर्य सत्याग्रह में पिता की मृत्यु की परवाह न करते हुए आर्य सत्याग्रह में भाग लिया, और सत्याग्रह को रात-दिन एक करके सफल बनाया।


प्रतिनिधि सभा में भूमिका

सन् १९५३ में श्री बंशीलाल व्यास, आर्य प्रतिनिधि सभा हैदराबाद के मन्त्री चुने गये और अन्तिम समय तक रहे।
श्री व्यास जी के मन्त्री बनने के बाद उनके कन्धों पर एक बड़ा कार्यभार आ पड़ा।
श्री पं० नरेन्द्र जी प्रधान सभा को ऐसे ही त्यागी, निःसंकोच, धैर्यशील कर्मयोगी की आवश्यकता थी।
इन दोनों ने मिलकर आर्यसमाज का जो कार्य किया, उसको न केवल हैदराबाद राज्य की जनता अपितु समस्त भारत के आर्य कार्यकर्ता जानते हैं।


आस्था और निधन

आपका ईश्वर पर अटूट विश्वास था।
आपकी मृत्यु सन् १९५६ ई० में रेल दुर्घटना के कारण हुई।
श्री व्यास जी की मृत्यु से आर्यसमाज की बहुत बड़ी क्षति हुई है।


उपसंहार

धन्य हैं ऐसे साधु महात्मा।
इनसे मनुष्य को शिक्षा लेकर अपना जीवन आर्यसमाज की सेवा में लगाना चाहिये।