पापों में मन लगा है बार-बार किसलिए
जीवन बता तू खो रहा बेकार किसलिए ॥ पापों में…
ना मन का मैल धो सका, किसी का ना तू हो सका
फरेब झूठ में कभी तू, चैन से न सो सका
पापों के हाथ इतना तू लाचार किसलिए ॥ पापों में…
वीरान राह चल के स्वार्थ के तू मद में खो गया
धर्म से दूर होके तू अधर्म संग हो गया
सत्कर्म का विचार भी आया न किसलिए ॥ पापों में…
दुःखी को देख मन में तेरे आई ना कभी दया
दर्द-शरीक ना हुआ न आँसू पोंछने गया
बेक्स का ना तू बन सका गुमख्वार किसलिए ॥ पापों में…
इन्सां का जन्म लेके भी न क्यूँ इन्सान बन सका
इन्सानियत का खून करके क्या मिला तुझको बता ?
इन्सा इन्सों में दुश्मनी का वार किसलिए ॥ पापों में…
[दर्द शरीक दुसरे के दर्द में हिस्सा लेनेवाला (वीरान) उजाड़,सुना, (बेकस) मजबुर,लाचार (गुमख्वार) दुःख दूर करनेवाला।










