पाप की अन्तिम झाँकी

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अ॒प॒घ्नन्प॑वते॒ सृधोऽप॒ सोनो॒ अरा॑ग्णः। गच्छ्रन्निन्द्र॑स्य निष्कृतम्

॥ ऋ. ६.६३.२४

तर्जः मनदारील इन्नुम उन किनावुन कुण्डु ता

सा रे ग प नी सा, सा नी प ग रे सा आ ऽऽऽ
ठाठें मार रहा है, मेरे अन्दर, मस्ती का सागर
उर्दू या बैहूँ, चलूँ या फिरूँ, या कुछ करूँ? दातार ॥ ठाठें मार रहा।

इक हर्ष कारक मस्ती, मानों झूम रही है कश्ती
रस में डूबा, रात दिन मैं
हर कार्य ईश्वर के पवि शरण में प्रथम
रख रख कर अपने शुभ करम
कर लिया, प्रतिदिन स्तुति मन अवलोकन
चिन्तन मननम् निदिध्यासन
॥ ठाठें मार रहा।

सोमरस के घूँट से, पाप-बीज भी भागें
क्या है फिर बात? कैसा झंझावात ?
अभिमान काम क्रोध की आती हैं झाँकियाँ
धर्म का इक अस्थिर आवरण
रिपु आक्रमण निर्घण निर्मम अधमाधम
अवनत अवगुण अनुपासन
॥ ठाठें मार रहा।

शायद ये अन्तिम प्रवृत्ति, मिटने सदा ही चली
मैं ‘अदेवयु’, क्योंकर बनूँ
अदेवयु का कर लूँ आखिरी दर्शन
मार्ग दिखा दे अद्यतन
हे भगवन्! मृदुमन मधुहन् सोमामृतम्
मनहर हृद्गत हृदयंगम
॥ ठाठें मार रहा।

(पवि) पवित्र। (अवलोकन) खोज, अनुसंधान। (झंझावात) तूफान। (रिप) शत्रु। (निर्घण)
अयोग्य, निर्दय। (निर्मम) क्रूर। (अधमाधम) बुरे से बुरा। (अवनत) पतित गिरा हुआ।
(अनुपासन) उपासना रहित। (अदेवयु) पाप की ओर पापी (अयतन) नया। (मृदुमन)
कोमल मन वाला। (मधुहन्) सर्वव्यापक (विष्णु)। (सोमामृत) सोम से सना अमृत।
(हृद्ङ्गत) आन्तरिक, प्रिय, चित्त पर फैल हुआ। (हृदयंगम) मनोहर, मन में बैठा हुआ।