ओ३म् रस पीके मस्त हुआ मनवा

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ओ३म् रस पीके मस्त हुआ मनवा

जागा प्रेम मेरा ॥

मन मतवारा ओ३म् ओ३म् गाए

चरणों में बैठ प्रभु के आनन्द पाए

अन्तर्मन करे प्रभु से मीठी मीठी बतियाँ ॥ जागा प्रेम मेरा…

सत् कर्मों के बाग लगाए

ज्ञान के सुरभित पुष्प सजाए

खिलती प्रेम की नन्हीं नहीं कलियाँ ॥ जागा प्रेम मेरा….

अमृत छलका दे, दे चरणामृत मोहे

मिल जाए ब्रह्मरत्न और कुछ न सोहे

दर्शन को तरसे मन की ये अँखियाँ ॥ जागा प्रेम मेरा….

(सुरभित) सुगन्धित

तर्ज: कैसे दिन बीते कैसी बीती रतियाँ