ओ३म् प्र॒जाप॑तिश्च॒रति॒ गर्भे॑ अ॒न्तरजा॑यमानो बहु॒धा वि जा॑यते ।
तस्य॒ योनिं॒ परि॑ पश्यन्ति॒ धीरा॒स्तस्मि॑न् ह तस्थु॒र्भुव॑नानि॒ विश्वा॑ ।। १९ ।।
यजुर्वेद 31/19
ओ३म् ओ३म् ओ३म् ही ओ३म्
डोलो झूमो, गाओ ओ३म्
ओ३म् नाम का अमृत सोम
घोले चित्त रोम रोम
ओ३म् नाम का अक्षर अनवर
जिसमें छाया विस्तृत व्योम
भूतों-भुवनों का वो स्वामी
प्रजापति सबका कौन?
जो कुछ पाते हम संसारी
ओ३म् ही देता होके मौन
ओ३म् ओ३म् ओ३म् ही ओ३म्
नित्य नूतन सृष्टि सर्जन
नित्य पालन नित्य रक्षण
है त्रिलोकी आत्मा द्योतित
पाले स्थावर और जंगम
सर्वव्यापक वह अजन्मा
उसकी सत्ता वही प्रमाण
सबकी आत्मा सबकी ज्योति
उसी विधाता का है विधान
उसको हर कोई चाहे पाना
इसीलिए उसे ढूंढे ज़माना
देख उसे पाते ध्यानीजन
उसका हर शै मैं हैं ठिकाना
ध्यानी रमाते उसकी धुन
दिव्य शक्ति से लेते सुन
आशुतोष प्रभु उनके बनते
प्रेम से पिघले जैसे मोम
ओ३म् ओ३म् ओ३म् ही ओ३म्
हर दिशाओं विदिशाओं में
विराजमान है वो
विद्यमान है सदा से सिद्ध
प्रसिद्ध सर्वदा जो
काल ऐसा है ना कोई
ईश्वर जिसमें रहता ना हो
ना पड़े वो बन्धनों में
है अजन्मा सदा से वो
कौन सी ऐसी जगह है
विद्यमान जिसमें ना वो
हम सब लोग हैं उसकी प्रजा
और प्रजापति है सबका वो
चाहेगा जो प्रजापति को
मानव कर्म करे ना विलोम
ध्यानी के शुभ कर्म में होगा
ध्यान प्रभु का ओ३म् ही ओ३म्
ओ३म् ओ३म् ओ३म् ही ओ३म्
डोलो झूमो, गाओ ओ३म्
ओ३म् ओ३म् ओ३म् ही ओ३म्
ओ३म् ओ३म् ओ३म् ही ओ३म्










