निराकार ईश्वर और हम ।

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प्रेरक प्रसंग –

#डॉ_विवेक_आर्य

प्रसिद्ध स्पेनिश विचारक – जेवियर जुबिरी एक बार बाल कटवा रहे थे। बातों ही बातों में जेवियर और नाई के बीच इस बात पर बहस छिड़ गई कि ईश्वर है या नहीं।

नाई का कहना था, – ‘अगर ईश्वर होता तो दुनिया में शांति और खुशी होती न कि हिंसा और बीमारियां। अगर वह होता तो दिखाई देता लेकिन ईश्वर तो कहीं दिखता ही नहीं है।’

जेवियर का तर्क था – ईश्वर तो कण-कण में बसा हुआ है। बस उसे खोजने वाली नजर और साफ नीयत चाहिए।

बहस चलती रही और इस बीच नाई जेवियर के बाल भी काटता रहा। लोग भी इस बहस का मजा ले रहे थे। लेकिन बहस का कोई नतीजा नहीं निकला।बाल कटवा कर जेवियर नाई की दुकान के बाहर आ गए और सड़क पर इधर-उधर टहलने लगे। तभी उन्हें बढ़े हुए बाल और खिचड़ी दाढ़ी वाला एक युवक नजर आया। वह उस युवक को पकड़ कर फिर उस नाई की दुकान पर गए। उन्होंने उस नाई से कहा, ‘लगता है शहर में एक भी ढंग का नाई नहीं बचा है।’ इस पर नाई ने कहा, ‘क्या बात करते हैं? मैं इस शहर का सबसे बढ़िया नाई हूं। चारों और मेरे चर्चे होते हैं।’ इस पर जेवियर बोले अगर ऐसा होता तो इस नौजवान के बाल इतने बेढंगे क्यों हैं? इस पर नाई तपाक से बोला, ‘जब कोई मेरे पास आएगा, तभी तो मैं उसके बाल काट पाऊंगा। जब कोई आएगा ही नहीं तो मैं कैसे समझूंगा कि किसके बाल बढ़े हुए हैं।’इस पर जेवियर मुस्कुरा कर बोले, ‘ठीक कह रहे हो। अभी कुछ देर पहले तुम कह रहे थे कि ईश्वर है ही नहीं। अरे भाई कोई उसे खोजने जाएगा, उसका नाम लेगा, उसे पुकारेगा, उसे पाने की कोशिश करेगा, तभी तो ईश्वर मिलेगा। बिना कोई कर्म किए ईश्वर थोड़ी ही मिलेगा।’ उनकी इस बात से नाई निरुत्तर हो गया।निराकार ईश्वर सृष्टि के कण कण में विद्यमान है। हमें सदा कर्म करते हुए देख रहा हैं। इसलिए उनकी स्तुति, प्रार्थना एवं उपासना करते हुए सदैव उत्तम कर्म करने का संकल्प लीजिये।

स्वामी दयानन्दईश्वर के विषय में सत्यार्थ प्रकाश में लिखते है

ईश्वर यदि साकार होता तो व्यापक नहीं हो सकता। जब व्यापक न होता तो सर्वाज्ञादि गुण भी ईश्वर में नहीं घट सकते। क्योंकि परिमित वस्तु में गुण, कर्म, स्वभाव भी परिमित रहते हैं तथा शीतोष्ण, क्षुधा, तृष्णा और रोग, दोष, छेदन, भेदन आदि से रहित नहीं हो सकता।

अतः निश्चित है कि ईश्वर निराकार है

जो साकार हो तो उसके नाक, कान, आँख आदि अवयवों को बनाने वाला ईश्वर के अतिरिक्त कोई दूसरा होना चाहिये। क्योंकि जो संयोग से उत्पन्न होता हो उसको संयुक्त करने वाला निराकार चेतन आवश्य होना चाहिये। कोई कहता है कि ईश्वर ने स्वैच्छा से आप ही आप अपना शरीर बना लिया। तो भी यही सिद्ध हुआ कि शरीर बनाने के पूर्व वह निराकार था। इसलिये परमात्मा कभी शरीर धारण नहीं करता। किन्तु निराकार होने से सब जगत को सूक्ष्म कारणों से स्थूलाकार बना देता है।यजुर्वेद 40/8 मन्त्र में इसी सन्देश को इस प्रकार से बताया गया है-

स पर्य् अगाच् छुक्रम् अकायम् अव्रणम् अस्नाविरꣳ शुद्धम् अपापविद्धम् ।

कविर् मनीषी परिभूः स्वयंभूर् याथातथ्यतो ऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥

“वह सर्वत्र व्यापक हैं, वह सब प्रकार से पवित्र हैं, वह कभी शरीर धारण नहीं करता, इसलिए वह अवर्ण हैं,अर्थात उनमें फोड़े-फुंसी और घाव आदि नहीं हो सकते, वह शरीर न होने से नस-नाड़ी के बंधन से भी रहित हैं, वह शुद्ध अर्थात रजोगुण आदि से पृथक हैं, पाप उसे कभी बींध नहीं सकता अर्थात किसी प्रकार के पाप उसे कभी छु भी नहीं सकता, वह कवि अर्थात सब पदार्थों का गहरा क्रांतदर्शी ज्ञान रखने वाला हैं, वह मनीषी अर्थात अत्यंत मेधावी हैं अथवा जीवों के मानों की बातों को भी जानने वाला हैं, वह परिभू अर्थात पापियों का पराभव करने वाला हैं, स्वयंभू हैं अर्थात स्वयंसिद्ध हैं।