नाना पाटिल:

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महाराष्ट्र के स्वतंत्रता संग्राम के महानायक

महाराष्ट्र का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नायक के रूप में कई वीरों और योद्धाओं का वर्णन करता है, जिनमें से एक नाम क्रांतिसिंह नाना पाटिल का है। नाना पाटिल का जीवन एक प्रेरणा है, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अद्वितीय योगदान दिया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष की नई दिशा बनाई। उनका जीवन न केवल स्वतंत्रता के प्रति समर्पण का प्रतीक था, बल्कि उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों, अत्याचारों और असमानताओं के खिलाफ भी संघर्ष किया।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

नाना पाटिल का जन्म 3 अगस्त 1900 में महाराष्ट्र के सांगली जिले के बाहेगांव में हुआ। बचपन से ही उनका शरीर मजबूत था और उनकी शारीरिक क्षमता ने उन्हें बहुत से संघर्षों में सफलता दिलाई। वे अत्यधिक परिश्रमी थे और उनका प्रभावी व्यक्तित्व समाज के अन्य लोगों को आकर्षित करता था। शिक्षा के क्षेत्र में अपनी यात्रा समाप्त करने के बाद नाना पाटिल ने कुछ समय तक सरकारी नौकरी की, लेकिन उनका मन उसमें नहीं लगा। उनकी रुचि समाजसेवा और राजनीति में अधिक थी, और इसीलिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी। इसके बाद उनका जीवन स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक परिवर्तन के संघर्षों में समर्पित हो गया।

स्वतंत्रता संग्राम में सक्रियता

1930 में जब महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया, तो नाना पाटिल भी इस आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हो गए। गांधी जी के अहिंसक आंदोलन से नाना पाटिल सहमत नहीं थे, क्योंकि उनका मानना था कि भारतीयों को केवल अहिंसा के रास्ते से स्वतंत्रता नहीं मिल सकती। उन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापक सदस्य के रूप में हिंसक संघर्षों को अपनाया और स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका निभाई। उनका उद्देश्य था कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक समानांतर सत्ता स्थापित की जाए ताकि भारतीयों में आत्मसम्मान जाग सके।

“प्रति सरकार” का गठन

नाना पाटिल का स्वतंत्रता संग्राम में सबसे बड़ा योगदान था उनकी “प्रति सरकार” का गठन। 1940 में, उन्होंने सांगली जिले में ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक स्वतंत्र सरकार की स्थापना की, जिसे “प्रति सरकार” के नाम से जाना जाता है। उनका यह प्रयास भारतीय जनता को यह दिखाने के लिए था कि भारतीय स्वयं अपना शासन चला सकते हैं और ब्रिटिश शासन के बिना भी अपने जीवन को व्यवस्थित कर सकते हैं। “हम अपना प्रशासन स्वयं करेंगे” (आपुला आपण कारु कारभार) के नारे ने लोगों को उत्साहित किया और यह संदेश फैलाया कि भारतीयों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिरोध करना चाहिए।

नाना पाटिल ने अपनी “प्रति सरकार” के तहत कई महत्वपूर्ण कार्य किए। उन्होंने बाजार व्यवस्था, अनाजों की आपूर्ति, विवादों का निपटारा, डकैतों और साहूकारों को दंडित करने के लिए एक न्यायिक तंत्र स्थापित किया। इसके अलावा, उन्होंने एक सेना “तूफान सेना” का गठन किया, जिसने ब्रिटिश सरकार के प्रमुख संस्थानों पर हमले किए और अंग्रेजों को परेशान किया। इस प्रकार, नाना पाटिल ने सांगली और सतारा जिलों के लगभग 150 कस्बों में अपनी सरकार का प्रभाव स्थापित किया और ब्रिटिश शासन को खुली चुनौती दी।

संघर्ष और बलिदान

नाना पाटिल ने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण 1920 से 1942 तक अठारह बार जेल यात्रा की। 1942 से 1946 तक वे भूमिगत रहे और अंग्रेजी सरकार ने उन्हें पकड़ने के लिए बहुत प्रयास किए, लेकिन जनता के बीच उनकी अपार लोकप्रियता और सतर्कता के कारण वे हमेशा बचते रहे। भूमिगत रहते हुए, नाना पाटिल ने अपनी मां का अंतिम संस्कार भी किया, जब उनकी संपत्ति और घर अंग्रेजी सरकार ने जब्त कर लिया था। यह उनके अदम्य साहस और समर्पण का प्रमाण था कि वे ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपना संघर्ष जारी रखते हुए निजी कठिनाइयों का सामना कर रहे थे।

सामाजिक सुधार और योगदान

नाना पाटिल का जीवन केवल राजनीतिक संघर्ष तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने सामाजिक सुधारों के लिए भी महत्वपूर्ण कार्य किए। वे महात्मा फुले के सत्यशोधक समाज के दर्शन और शाहू जी महाराज के सामाजिक कार्यों से प्रभावित थे। नाना पाटिल ने मितव्ययी विवाहों को बढ़ावा दिया, शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए पुस्तकालयों की स्थापना की, और अंधविश्वासों के खिलाफ जागरूकता फैलाई। उन्होंने नशे की आदतों से ग्रामीण जनता को मुक्त करने का भी प्रयास किया।

भारत की स्वतंत्रता के बाद, नाना पाटिल ने आचार्य अत्रे के साथ संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। वे शेतकारी कामगार पक्ष और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े और राजनीति में सक्रिय रहे। उन्होंने महाराष्ट्र के सतारा और बीड क्षेत्रों का विधानसभा में प्रतिनिधित्व किया और लोकसभा में भी अपनी भूमिका निभाई। 1957 में लोकसभा में उनके मराठी में दिए गए भाषणों ने उन्हें एक प्रभावी नेता के रूप में पहचान दिलाई।

निधन और विरासत

नाना पाटिल का निधन 6 दिसंबर 1976 को हुआ, लेकिन उनका जीवन हमेशा जीवित रहेगा। उनकी प्रेरक गाथाएं, संघर्ष और संघर्ष के दौरान किए गए सामाजिक सुधार आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। उनकी कड़ी मेहनत और समर्पण के कारण, उन्होंने न केवल स्वतंत्रता संग्राम में योगदान दिया बल्कि भारतीय समाज में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन लाए।

उनकी पुण्यस्मृति में, मराठी फिल्म निर्माता गजेंद्र अहीर ने उनकी जीवनगाथा पर आधारित फिल्म “प्रति सरकार” बनाई, जिससे उनकी वीरता और संघर्ष को बड़े पर्दे पर जीवित रखा गया। नाना पाटिल का जीवन हमें यह सिखाता है कि असली स्वतंत्रता केवल राजनीतिक आज़ादी में नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग को समान अधिकार और सम्मान मिलने में है।

नाना पाटिल का जीवन एक प्रेरणा है और उनके योगदान को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। उनके आदर्श और संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक अमूल्य हिस्सा हैं, और उनका नाम सदा सम्मान के साथ लिया जाएगा।

क्रान्ति सिंह की उपाधि जिनके नाम का एक अभिन्न भाग ही बन गयी थी, ऐसे क्रान्ति सिंह नाना पाटिल का नाम महाराष्ट्र में स्वतंत्रता संग्राम के उन योद्धाओं में सर्वप्रमुख रूप से लिया जाता है, जिन्होंने सतारा और सांगली जिलों में ब्रिटिश शासन के विरोध में प्रति सरकार का एक बिलकुल अनूठा और नया प्रयोग किया और एक समानांतर सत्ता तंत्र खड़ा कर ब्रिटिश सत्ता को सीधे चुनौती दे डाली।

क्रान्तिसिंह नाना पाटिल के रूप में जाने गए नानासाहेब रामचंद्र पाटिल का जन्म 3 अगस्त 1900 में वर्तमान महाराष्ट्र के सांगली जिले के बाहेगांव में हुआ था। बचपन से ही उनका शरीर शक्तिशाली था, जिसे अपने परिश्रम और अभ्यास से उन्होंने और दृढ और सुगढ़ बना लिया था। बाद में उनकी इसी सुगठित देहयष्टि और प्रभावी व्यक्तित्व ने लोगों को उनकी तरफ आकर्षित करने में उनकी अत्यंत सहायता की, जिसके बल पर वो अपने समर्थकों की एक श्रृंखला तैयार कर सके।

अपना अध्ययन समाप्त करने के पश्चात उन्होंने कुछ समय तक सरकारी नौकरी की, परंतु सामाजिक सेवा और राजनीति में उनकी तीव्र रूचि ने इसमें उनका मन अधिक समय तक नहीं लगने दिया और शीघ्र ही उन्होंने नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया। देश और क्षेत्र में चल रहे ब्रिटिश विरोधी आन्दोलनों और अभियानों से वे अछूते ना रह सके और 1930 में उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन में बढ़चढ़ कर भाग लिया और इसी के साथ प्रारम्भ हुआ उनका स्वतंत्रता आंदोलन के साथ गहरा जुड़ाव। गाँधी जी के अहिंसक तरीकों के प्रति उनकी रंचमात्र भी श्रद्धा नहीं थी और इसीलिये उन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोशियेशन के स्थापक सदस्य के रूप में हिंसक तरीकों को इस्तेमाल किया।

उन्होंने ग्रामीणों को उनकी गुलाम स्थिति और अंग्रेजों के हाथों उनके उत्पीडन के प्रति जागरूक करने के अथक एवं अनवरत प्रयास किये और लोगों के अंदर से भय निकालने के लिए दिन रात एक कर दिया। उनके अंदर लोगों को उनकी ही भाषाशैली में समझाने और उन्हें प्रेरित-प्रभावित करने की ईश्वरप्रदत्त क्षमता थी और इसी के बल पर उन्होंने वारकरी समुदाय के लोगों के दिलों में अपना एक अलग ही स्थान बनाया। नाना पाटिल का स्वतंत्रता आंदोलन में अप्रतिम योगदान ये था कि उन्होंने ग्रामीण समुदाय के लोगों के मन में आत्मसम्मान का भाव जगाकर उन्हें आज़ादी की लड़ाई के आंदोलन का भाग बनाया।

उनका मत था कि अत्याचारी ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक समानान्तर सत्ता स्थापित करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यही अंग्रेजों के मन में भारतीयों का भय उत्पन्न करेगा। इसी उद्देश्य को दृष्टिगत रखते हुए उन्होंने 1942 के भारत छोडो आंदोलन में ‘आपुला आपण कारु कारभार’ (हम अपना प्रशासन स्वयं करेंगे) जैसे नारे को जन जन तक पहुँचाया। ब्रिटिश सत्ता को सीधे चुनौती देते हुए उन्होंने अंग्रेजी शासन प्रशासन को अस्वीकार कर दिया और 1940 में ही सांगली में ‘प्रति सरकार’ नाम से एक स्वतंत्र सरकार की स्थापना की। उनकी इस प्रति सरकार का प्रचार प्रख्यात कवि जी. डी. माडगूळकर के लिखे और स्वरबद्ध किये एवं शाहिर निकम के ओजपूर्ण स्वर में गाये पोवाड़ा (कथागीतों) के माध्यम से दूर-सुदूर तक किया गया।

नाना पाटिल की इस प्रति सरकार ने आम जनता के हितार्थ अनेकानेक कार्य किये और बाजार व्यवस्था, अनाजों की आपूर्ति-वितरण व्यवस्था आदि के साथ साथ लोगों के विवादों का निपटारा करने और डकैतों, साहूकारों एवं महाजनों को दण्डित करने के लिए एक न्यायिक तंत्र की भी स्थापना की। अपनी इस सरकार के अंतर्गत उन्होंने तूफ़ान सेना नाम से एक आर्मी का भी गठन किया। अपनी इस सेना के जाबांज योद्धाओं के बलबूते उन्होंने ब्रिटिश सरकार के रेलवे और डाक जैसे प्रमुख संस्थानों पर लगातार हमले कर अंग्रेजों को लगातार परेशान रखा। नाना पाटिल की ये प्रति सरकार 1943 से 1946 के मध्य सांगली और सतारा जिलों के लगभग 150 कस्बों और उनसे जुड़े इलाकों में पूरी तरह कार्यशील रही। बाद में प्रति सरकार के इस प्रयोग से प्रेरणा लेकर आंदोलनकारियों ने पूरे देश में अनेकों स्थानों पर इस प्रयोग को दोहराया और अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देते हुए प्रति सरकारें स्थापित कीं।

देश की आज़ादी के संघर्षों में 1920 से 1942 के मध्य नाना पाटिल को अट्ठारह बार जेल जाना पड़ा। 1942 से 1946 तक वो भूमिगत रहे और उनको पकड़ने के लिए सरकार ने उनके सर पर अच्छा ख़ासा इनाम रखा, परंतु उनके प्रति जनता के अपार प्रेम और उनकी सतर्कताओं के कारण लाख प्रयासों के बाबजूद अंग्रेजी सरकार उन्हें पकड़ नहीं सकी। जब वो भूमिगत थे, तब सरकार ने उन पर दबाव बनाने के लिए उनके घर व संपत्ति को जब्त कर लिया और इसी दौरान उनकी माता जी का निधन हो गया, परंतु ये उनकी हिम्मत ही थी अंग्रेजी सरकार के तमाम प्रयासों को धता बताकर और अपने जीवन को खतरे में डालकर उन्होंने अपनी माताजी का अंतिम संस्कार किया और जब तक अंग्रेजी पुलिस उन्हें पकड़ पाती, वो फिर गायब हो गए। उसके बाद फिर वो कराड तालुके में 1946 के अंत में सार्वजनिक रूप से तब नज़र आये, जब देश को स्वतंत्रता मिलना निश्चित हो गया था।

नाना पाटिल, महात्मा फुले के सत्यशोधक समाज के दर्शन एवं शाहू जी महाराज के सामाजिक कार्यों से गहरे तक प्रभावित थे और इसी के चलते उन्होंने अनेकों माध्यमों से सामाजिक परिवर्तन एवं सुधार लाने का प्रयास किया। उनके सामाजिक कार्यों में प्रमुख हैं–मितव्ययी विवाह समारोहों (गांधी विवाह पद्धति) का प्रचार, शिक्षा का प्रचार-प्रसार, पुस्तकालयों की स्थापना, अंधविश्वासों का निर्मूलन, ग्रामीण जनता को नशे से मुक्ति दिलाना आदि आदि। उनके संपर्क और सानिध्य में आकर शाहिर निकम और नागनाथ अण्णा जैसे सामजिक कार्यकर्ता देश को मिले, जिन्होंने आजीवन समाज के लिया कार्य किये।

देश की स्वतंत्रता के बाद उन्होंने आचार्य अत्रे के साथ संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन में बढ़चढ़ कर भाग लिया और शेतकारी कामगार पक्ष एवं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जरिये राजनैतिक आन्दोलनों एवं क्रियाकलापों में अपनी भूमिका निभाई। उन्होंने सतारा और बीड क्षेत्रों का विधानसभा में प्रतिनिधत्व किया और लोकसभा के सदस्य के तौर पर भी अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया। 1957 में चुने जाने के बाद लोकसभा में उनके मराठी में दिए गए भाषणों ने उनकी एक अलग पहचान बनायी। स्वतंत्रता के पूर्व से ही ना केवल सतारा, बल्कि पूरे महाराष्ट्र को प्रभावित करने वाले इस ख्यात व्यक्तित्व का 6 दिसंबर 1976 में निधन हो गया। उनके यशस्वी जीवन को जन जन तक पहुंचाने के लिए मराठी फिल्मों के जाने माने निर्देशक गजेंद्र अहीर ने ए एस आर मीडिया द्वारा निर्मित फिल्म प्रति सरकार में इस क्रांति सिंह के जीवन को पूरी ईमानदारी के साथ परदे पर उतारने का प्रयास किया है। आज उनकी पुण्यस्मृति में विनम्र श्रद्धांजलि एवं शत शत नमन।

~ साभार : विशाल अग्रवाल