नहीं राज्य कुराज्य भला जग में, बिन राजा ही सुखदाई है।
नहीं राज्य कुराज्य भला जग में,
बिन राजा ही सुखदाई है।
नहीं मित्र कुमित्र भला संग में,
संग रह कर हो दु:ख दाई है।
नहीं शिष्य कुशिष्य से सुख होता,
बिन शिष्य ही शकल भलाई है।
नहीं दुष्ट भार्या घर अच्छी,
दुष्टा संग रहत लड़ाई है।
ना घड़ी चैन से “कर” शोभा,
“कर” शोभा दान से पता है।
ना चंदन से तन स्वच्छ बने,
जल से पवित्र हो जाता है।
ना ज्ञान बिना मुक्ति होती,
क्यों वृथां तिलक लगाता है।
ना मगन मान बिन हो”धर्मी”,
क्यों हलवा खीर खिलाता है।
(उद्दालक ऋषि जी अश्वपति से कहते हैं।)
मेरे राज्य में कर नहीं कोई,
मूरख मूढ गंवार नहीं।
धर्म धनी सब ही बसते हैं,
मदिरा से करें प्यार नहीं।
अग्निहोत्र घर-घर में करते,
दुराचारिणी नारि नहीं।
“धर्मी”में भी धर्मी हूं फिर,
भोजन क्यों स्वीकार नहीं।
(विद्यार्थी को आठ अवगुण वर्जित)
ना काम की चाह रहे मन में,
ना क्रोध का ठोर ठिकाना हो।
ना लेश मात्र भी लोभ करे,
ना भक्ष्य में स्वाद मानना हो।
ना तन का ही श्रृंगार करे,
ना नाच रंग में जाना हो।
ना अति निद्रा ना सेवा हो,
तब”धर्मी”विद्या पाता हो।










