मोतीलाल राय

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चन्द्रनगर : क्रान्तिकारियों की सुरक्षित शरणस्थली
कलकत्ता से लगभग 50 किलोमीटर दूर गंगा तट पर स्थित Chandannagar उस समय फ्रांसीसी अधीन था। यहाँ अंग्रेजी शासन नहीं था, इसलिए अंग्रेज़ी पुलिस सीधे किसी को गिरफ्तार नहीं कर सकती थी। यद्यपि व्यवहार में अंग्रेज़ फ्रांसीसी प्रशासन पर दबाव डालते थे, फिर भी आपसी प्रतिद्वन्द्विता के कारण फ्रांसीसी अधिकारी हर बार अंग्रेजों की बात नहीं मानते थे।
इसी स्थिति का लाभ उठाकर बंगाल के क्रान्तिकारियों ने चन्द्रनगर को अपना प्रमुख अड्डा बना लिया। यहाँ बम बनाने के कारखाने, शस्त्रों के गोदाम और प्रशिक्षण की व्यवस्था थी।
🔹 प्रवर्तक संघ की स्थापना – “मंत्र और तंत्र” का समन्वय
मोतीलाल राय ने ‘प्रवर्तक संघ’ की स्थापना की। यह संघ अध्यात्म (मंत्र) और सशस्त्र क्रान्ति (तंत्र) – दोनों का समन्वय था।
मंत्र : ईश्वर में अटूट विश्वास और पूर्ण समर्पण।
तंत्र : देश को स्वतंत्र कराने हेतु आवश्यकता पड़ने पर सशस्त्र संघर्ष।
वे स्वयं प्रत्यक्ष हिंसात्मक कार्यों में कम भाग लेते थे, परन्तु क्रान्तिकारियों को धन, शस्त्र और आश्रय प्रदान करते थे।
🔹 जन्म और प्रारंभिक जीवन
मोतीलाल राय का जन्म 6 जनवरी 1882 को बोराई-चंडीटोला में हुआ। 10 अप्रैल 1958 को उनका निधन हुआ।
उन्होंने स्वामी सच्चिदानन्द से ब्रह्म मंत्र की दीक्षा ली थी, परन्तु वे संन्यासी नहीं, बल्कि सद्गृहस्थ थे। 1906 में उन्होंने और उनकी पत्नी राधारानी ने ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया।
🔹 अरविन्द घोष से सम्पर्क
अलीपुर बम कांड के बाद Aurobindo Ghose 1910 में चन्द्रनगर आये। जिनके भरोसे वे आये थे, उन्होंने असमर्थता जताई, तब मोतीलाल राय ने अपने घर में उनके रहने की व्यवस्था की।
अरविन्द घोष का मत था कि भारत की स्वतंत्रता सशस्त्र क्रान्ति से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति और योग साधना से मिलेगी। उन्होंने मोतीलाल राय को ‘आत्म समर्पण योग’ का उपदेश दिया।
यद्यपि मोतीलाल जी ने मंत्र को अपनाया, परन्तु तंत्र (क्रान्ति कार्य) को पूर्णतः नहीं छोड़ा।
🔹 क्रान्ति आन्दोलन की धुरी
मोतीलाल राय का आश्रम बंगाल के क्रान्ति आन्दोलन का केन्द्र था। वे धन, रिवाल्वर, बम, विदेश भेजने की व्यवस्था—सब करते थे।
🔸 रासबिहारी बोस
Rash Behari Bose कई बार उनके आश्रम आये। जापान जाने हेतु धन और पासपोर्ट की व्यवस्था मोतीलाल राय ने की।
🔸 कन्हाईलाल दत्त
Kanailal Dutta द्वारा अलीपुर जेल में नरेन्द्र गोस्वामी की हत्या में प्रयुक्त रिवाल्वर मोतीलाल राय ने ही भिजवाये थे।
🔸 बाघा जतिन और सूर्यसेन
Bagha Jatin तथा Surya Sen का भी प्रवर्तक संघ से घनिष्ठ सम्बन्ध था।
🔹 गांधी जी के साथ रोचक प्रसंग
एक बार कलकत्ता में Mahatma Gandhi से उनकी भेंट हुई। गांधी जी ने उनके क्रान्तिकारी कार्यों का पूरा वृत्तान्त सुना और फिर पुलिस कमिश्नर Charles Augustus Tegart को फोन कर कहा कि यदि चाहें तो मोतीलाल राय को गिरफ्तार कर सकते हैं।
टैगार्ट असमंजस में पड़ गये और गिरफ्तारी नहीं की। गांधी जी का तर्क था कि यदि वे गिरफ्तार होते, तो देश उन्हें भलीभांति जान पाता।
🔹 पुलिस तलाशी और साहस
चार्ल्स टैगार्ट ने फ्रांसीसी प्रशासन की सहायता से मोतीलाल राय के घर की तलाशी ली। बम बनाने के संकेत मिले, परन्तु कोई प्रमाण नहीं मिला।
टैगार्ट उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सका, जबकि उसने लार्ड हार्डिंग बम कांड में संलिप्तता का आरोप लगाया था।
🔹 प्रवर्तक संघ का विस्तार
चन्द्रनगर में प्रवर्तक संघ के अंतर्गत अनेक संस्थाएँ स्थापित हुईं:
प्रवर्तक पाठशाला
छात्रावास एवं कन्या छात्रावास
प्रवर्तक बैंक
प्रवर्तक प्रकाशन
जूट मिल्स, खादी प्रतिष्ठान, मुद्रणालय आदि
ये संस्थान आत्मनिर्भर थे और राष्ट्रीय चरित्र निर्माण पर बल देते थे।
🔹 दिशा परिवर्तन : चरित्र निर्माण की ओर
कुछ घटनाओं—दान के दुरुपयोग, क्रान्तिकारियों के दुर्व्यसन—ने उन्हें आत्ममंथन के लिए विवश किया।
अंततः 1916 में उन्होंने Aurobindo Ghose की सलाह मानकर सशस्त्र क्रान्ति का मार्ग त्याग दिया और राष्ट्रीय चरित्र निर्माण को ही प्रवर्तक संघ का मुख्य उद्देश्य बना दिया।
🔹 निष्कर्ष
मोतीलाल राय केवल एक क्रान्तिकारी नहीं, बल्कि आध्यात्म और राष्ट्रवाद के अद्भुत समन्वयक थे। वे बंगाल के क्रान्ति आन्दोलन की धुरी रहे। उनके जीवन का संदेश था—
“स्वराज्य से भी बढ़कर है मनुष्य का चरित्र।”