ओ३म् तवा॒हम॑ग्न ऊ॒तिभि॑र्मि॒त्रस्य॑ च॒ प्रश॑स्तिभिः।
द्वे॒षो॒युतो॒ न दु॑रि॒ता तु॒र्याम॒ मर्त्या॑नाम् ॥६॥
ऋग्वेद 5/9/6
मित्रता तोड़ूँ ना, मैं तेरी, हे सखा !!
तेरे ही सख्य में नित्य मेरा मन लगा
धन्य होता हूँ मैं, तेरी रक्षा को पा
मुझे तू पाप दुरितों से निरन्तर छुड़ा
मित्रता तोड़ूँ ना
मानव संकटों से चहुं ओर घिरा
कर कृपा तू उनको बचा
अतिवृष्टि, अनावृष्टि हो रही
ज्वालामुखियों की ज्वाला
कहीं डूबी कश्तियाँ
भय आग का
मित्रता तोड़ूँ ना, मैं तेरी, हे सखा !!
हिंसक पशुओं का भी तो भय लगा
सिंह चीते सर्प व्याघ्र का
मगरमच्छ भेड़िए बिच्छू का डंख
कहीं आतंक शत्रुता
इन सबसे प्रभु
करो रक्षा
मित्रता तोड़ूँ ना, मैं तेरी, हे सखा !!
द्वेषी-शत्रुजन हमें सता रहे
शत्रुता का भय दिखा रहे
लोभी अपने स्वार्थ के लिए
छल से लूटते जा रहे
धूर्तता के जाल से
हमें बचा
मित्रता तोड़ूँ ना, मैं तेरी, हे सखा !!
विपदा से बचने के लिए
पुरुषार्थ काम आएगा
साथ में तेरी दया जो मिले
कष्ट पास कहाँ आएगा ?
मुझपे अन्यों पे प्रभु
कर कृपा
मित्रता तोड़ूँ ना, मैं तेरी, हे सखा !!
हे अग्रनायक !! अग्नि देव !!
तुम तो मित्र और सखा भी हो
सुप्रशस्तियों के भी हो तुम धनी
हम सबका गौरव भी हो
कृपा करो हम भी लाभ
लें उठा
मित्रता तोड़ूँ ना, मैं तेरी, हे सखा !!
परोपकारी न्यायकारी निर्विकार
निर्बलों के सर्वतः रक्षक
हैं अनन्त नाम तेरे और गुण
सुप्रशस्तियों से भर दो घट
पथिप्रज्ञ बन दिखा
सही दिशा
मित्रता तोड़ूँ ना, मैं तेरी, हे सखा !!
तेरे ही सख्य में नित्य मेरा मन लगा
धन्य होता हूँ मैं, तेरी रक्षा को पा
मुझे तू पाप दुरितों से निरन्तर छुड़ा
मित्रता तोड़ूँ ना|










