मित्र और वरुण की स्तुति का लाभ

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प्र वयो॑ मि॒त्राय॑ गायत॒ वरु॑णाय वि॒पा गिरा। मह॑िक्षत्रावृतं वृहत्

॥ ऋः ५.६८.१ साम. ११४३

तर्जः मी ही अशी भोळी कशी ग

गीत स्तुति गाये ये वाणी (2)
गाये वाणी।
प्रभु तारते विध्न बाधाओं से
हम प्रार्थी हैं, प्रभु है दानी
गाये वाणी॥
॥ गीत ॥

मित्र वरुण प्रभु जीवों को पाले
सत्मार्ग ले जाके सम्भाले
हितचिन्तक को मित्र बना ले (2)
ईश-स्तवन से वाणी सजा ले
वर ले वरुण, जो रत्नों का स्वामी॥
॥ गीत ॥

जीवन सार्थक वरुण-वरण में
अगणित सुख मिले गुण कीर्तन में
मिले सज्जनों से मान जीवन में (2)
पाप निवारें करें ना हानि,
मिले आनन्द, हो तृप्ति रूहानी॥
॥ गीत ॥

(प्राथर्थी) प्रार्थना करने वाला। (स्तवन) स्तुति। (बरण) पूजा, अर्चना, सत्कार। (रूहानी)
आत्मिक स्तर पर।