मेरी प्राण प्रिय ने भेजा लिख चिट्ठी में सन्देशा।

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मेरी प्राण प्रिय ने भेजा लिख चिट्ठी में सन्देशा।

मेरी प्राण प्रिय ने भेजा
लिख चिट्ठी में सन्देशा।
कि घर कब आवोगे कि
घर कब आवोगे॥
लिख रही जवाब तो दे दो
कैसे हो लिखकर भेजो।
क्या यह भी ना बताओगे॥
कि घर कब आवोगे….

यह जानना चाहती हूँ
घर आना होगा कब तक।
आने की राह देखते छः
मास बीत गये अब तक॥
राह कब तक दिखावोगे॥1॥
कि घर कब आवोगे….

गुड़िया हर रोज पूछती
कब पापा घर आयेंगे।
मुन्ना कहता मेरी खातिर
बन्दूक एक लायेंगे॥
इन्हें कितना बहकाओगे॥2॥
कि घर कब आवोगे….

वृद्ध पिता और माता
खत लिखने को कहते हैं।
हम मरेंगे जब आवेगा
बस आँसू ही बहते हैं॥
क्या और भी रुलाओगे॥3॥
कि घर कब आवोगे….

इतना तो जानती हूँ
आना नहीं अपने वश में।
हर रोज पूछते हैं
बच्चों ने करी विवश मैं।
! रूठे तुम खुद मनाओगे॥4॥
कि घर कब आवोगे….

फागुन तो बीत गया है
सावन अब आने वाला।
कंगन मेरी कर की चूड़ी
रही पूछ गले की माला।
उन्हें भब तो बुलाओगे॥5॥
कि घर कब आवोगे….

तन के आभूषण जितने
जंजीर ये नथनी टीका।
नारी का बिना पति के
श्रृंगार ये ‘कर्मठ’ फीका॥
कब आकर सजाओगे ॥ 6 ॥
कि घर कब आवोगे….