मेरे देश की ललनाओं वीरांगना बन दिखलाओ तुम।
मेरे देश की ललनाओं वीरांगना
बन दिखलाओ तुम।
अब आगे कदम बढ़ावो तुम॥
आज पतन की घड़ियों में
उत्थान का दीप जलाओ तुम॥ टेक ॥
पश्चिम के रंग में रंगकर के
सबला से बनगई हो अबला।
पूरब की सभ्यता अपनाओ तो
बन जाओगी फिर सबला॥
संभला जाये तो तुम संभलो
दामन गंदगी से बचाओ तुम॥1॥
पश्चिम की सभ्यता नग्न करे,
पूरब की तन ढकने वाली।
पश्चिम में अन्धेरा होता है
पूरब में चमकती है लाली॥
काली रजनी क्यों बनो चन्द्र
की ज्योत्सना बनजाओ तुम॥2॥
वाणी की मधुरता नयन की लज्जा,
आभूषण होती तन का ।
बिना चरित्र के लाख सजाओ,
क्या है इस सुन्दर तन का॥
मन का विकार बुरा होता है
मन को शुद्ध बनाओ तुम ॥3॥
इतिहास के पन्नों पर अंकित
है जौहर उन ललनाओं का।
मुश्किल की घड़ियों में भी
सामना किया सदा बाधाओं का॥
बाहों का बल दिखलाया क्या
सच ये नहीं बताओ तुम॥4॥
किरणमई दुर्गा पद्मा
लक्ष्मीबाई विकाल बनी।
वह गोरों का दल कांप गया
जब रानी की भृकुटि तनी ॥
दामिनी सी चमकी रण में
उस रानी को ना भुलाओ तुम ॥5॥
तुम चाहो तो गिरी भावना
भी सम्मान में बदलेंगी।
तुम चाहो तो पतन की
घड़ियां भी उत्थान में बदलेंगी॥
पहले की तरह कर्मठ अपनी
उस कीर्ति को चमकाओ तुम॥6॥










