मेरा सखा तो है वही
मेरा सखा तो है वही
जिसका कि ओं नाम है।
उसके सिवाय न दुसरा
ढूँढा जहाँ तमाम है।
जाता नहीं हूँ ढूँढ़ने
काशी व काबा में कभी।
दिल की सफाई से उसे
मिलने का मेरा काम है।
रचना ही उसका रूप है
प्रीतम जो सुन्दर स्वरूप है।
उससे मिलाप के लिए
कोई न रोक थाम है।
वश में है जिसने मन किया
उसने आनन्द पा लिया।
लागी लगन है देश को
प्रातः चाहे शाम है।
मेरा सखा तो है वही
जिसका कि ओं नाम है।










