मेरा रंग दे बसंती चोला।

0
74

मेरा रंग दे बसंती चोला।

मेरा रंग दे बसंती चोला।

हाथ में गीता गले में फांसी
मन में ये उद्‌गार थे।
जिस धरती पे मिटूं में
उसमें जन्मू अनेकों बार मैं।
चाहे जब भी जन्तूं
लेकिन मिले वसन्ती चोला।

वड़ा ही गहरा दाग है
यारो जिसका गुलामी नाम है।
उसका जीना भी क्या जीना
जिसका देश गुलाम है।
सीने में जो दिल था
यारो आज बना वो शोल

जिस चोले को पहन
शिवाजी खेले अपनी जान पे।
जिसे पहन झांसी की
रानी मिट गई अपनी आन पे।
आज उसी को पहन के
निकला हम मस्तों का टोला।

दम निकले इस देश की
खातिर बस इतना अरमान है।
एक बार इस राह पे मरना
सौ जन्मों के समान है।
देख के वीरों की कुर्बानी
अपना दिल भी बोला।

इसे पहनकर मिटे
सैकड़ों जलियांवाले बाग में।
कूदे सर पे कफन बांध के
इन्कलाब की आग में।
इसे पहनकर खुदीराम भी
वन्दे मातरम् बोला।

इसे पहन सीने पे
गोली खाई मदनगोपाल ने।
इसे पहनकर वार किया था
बिस्मिल और आजाद ने।
इसे पहनकर भगतसिंह ने
फैका बम का गोला।

बेड़ी और हथकड़ी में
बस एक यही झनकार है।
इस चोले को वही पहनता
जिसे देश से प्यार है।
वीर वही संगीन के आगे
जिसने सीना खोला।