माता सरस्वती जिज्ञासु जी

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ख्वाहिश बड़ी थी मन में उनके बिना न जिऊँ…”—यह मार्मिक पंक्तियाँ उस वीरांगना की हैं, जिसने भरी जवानी में अपने पति को धर्म की रक्षा के लिए खो दिया, किंतु अपने हृदय में उनके आदर्श और वैदिक धर्म के प्रति अटूट निष्ठा को सदैव जीवित रखा।

माता सरस्वती जिज्ञासु जी अमर बलिदानी महाशय राजपाल जी की धर्मपत्नी थीं। जब वैदिक संस्कृति और मर्यादा पर आघात हुआ और “सीता का छिनाला” नामक पुस्तक में माता सीता के पवित्र चरित्र पर अशोभनीय टिप्पणियाँ की गईं, तब महाशय राजपाल जी ने उसके विरोध में “रंगीला रसूल” पुस्तक प्रकाशित की।

धर्म और सत्य के इस साहसिक कार्य के कारण कट्टरपंथियों में आक्रोश फैल गया और अंततः इलमुद्दीन ने उनकी हत्या कर दी।किन्तु इस बलिदान के पीछे जो सबसे बड़ा त्याग था, वह एक पत्नी का था—माता सरस्वती जिज्ञासु जी का त्याग।

उन्होंने अपने जीवन के सबसे प्रिय सहचर को धर्म की रक्षा के लिए खो दिया, फिर भी उनके हृदय में न तो दुर्बलता आई और न ही धर्म के प्रति श्रद्धा कम हुई।उनके द्वारा अपने बलिदानी पति को लिखी गई श्रद्धांजलि पढ़कर हृदय पसीज जाता है। यह केवल एक पत्नी की वेदना नहीं, बल्कि धर्म के लिए दिए गए महान बलिदान की अमर गाथा है।ऐसी महान आर्य वीरांगना माता सरस्वती जिज्ञासु जी को कोटि-कोटि नमन।