मन तृष्णा पूर्ण नहीं होय

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मन तृष्णा पूर्ण नहीं होय

मन तृष्णा पूर्ण नहीं होय
एक के पीछे दूजी बैरन
रस्ता रोक खलोये
मन तृष्णा पूर्ण नहीं होय

वो करम ना कर पाये जो
करने जगत् में आये
कदम-कदम पर मन ललचाये
मुक्ति कैसे पाये
मन की स्थिरता से ही प्राणी
मोक्ष को प्राप्त होय
मन तृष्णा पूर्ण नहीं होय

खेल में बचपन और जवानी
अँखियाँ मूँद गँवाई
आँख खुली जब
पिछला प्रहर था

जितनी जरूरत है जीवन में
उतने ही साधन जोड़ो
पूरे नहीं जो हो पायेंगे
सपने में दे वो छोड़ो
व्यर्थ का सपना ही दुनिया में
दु:ख का कारण होय
मन तृष्णा पूर्ण नहीं होय

मन तृष्णा पूर्ण नहीं होय
एक के पीछे दूजी बैरन
रस्ता रोक खलोये
मन तृष्णा पूर्ण नहीं होय

मन तृष्णा पूर्ण नहीं होय
एक के पीछे दूजी बैरन
रस्ता रोक खलोये
मन तृष्णा पूर्ण नहीं होय

वो करम ना कर पाये जो
करने जगत् में आये
कदम-कदम पर मन ललचाये
मुक्ति कैसे पाये
मन की स्थिरता से ही प्राणी
मोक्ष को प्राप्त होय
मन तृष्णा पूर्ण नहीं होय

खेल में बचपन और जवानी
अँखियाँ मूँद गँवाई
आँख खुली जब
पिछला प्रहर था

जितनी जरूरत है जीवन में
उतने ही साधन जोड़ो
पूरे नहीं जो हो पायेंगे
सपने में दे वो छोड़ो
व्यर्थ का सपना ही दुनिया में
दु:ख का कारण होय
मन तृष्णा पूर्ण नहीं होय

मन तृष्णा पूर्ण नहीं होय
एक के पीछे दूजी बैरन
रस्ता रोक खलोये
मन तृष्णा पूर्ण नहीं होय

रचना व स्वर :- श्री विजय आनन्द जी