मन तो चंचल है इसे वश में जरा लाने दो
तर्ज : जल के दिल खाक हुआ आँख से रोया न गया
मन तो चंचल है इसे वश में जरा लाने दो
ईश चरणों में इसे शरण मिले आने दो ॥ मन तो ॥
आए दुःख रोता है मन आँख में आँसू भरभर
धर के धीरज इसे दुःख दर्द को मिटाने दो ॥ मन तो ॥
ये चकाचौंध ज़माना तो बस छलावा है
लोभ में इसके कभी मन को न तुम आने दो ॥ मन तो ॥
मन भटक जाए तो बस मूँद लो आँखें पलभर
मन को खुद अपने ही मन्दिर में जरा जाने दो ॥ मन तो ॥
प्रभु के ध्यान में खो जाने दे तू निज मन को
मोक्ष सागर से मन की नैया को तर जाने दो ॥ मन तो ॥
तू ‘ललित’ मन की डोर दे दे प्रभु के हाथों में
मन को सत्कर्म की सही राह गुज़र जाने दो ॥ मन तो ॥










