मन क्यूँ तेरा भरमाए….बन्दे
शरण प्रभु की ना आए….॥ मन क्यों…
सूना पड़ा तेरा मन का मन्दिर
घोर अन्धेरा मन के अन्दर
उलझन सुलझ न पाए…(2) तेरी ॥ शरण प्रभु की…
लोभ व्यसन में मन क्यूँ लागा
राग द्वेष से दूर ना भाग
इत उत चित्त रम जाए….(2) तेरा ॥ शरण प्रभु की…
ना जाने तू प्रीत की भाषा
फिर भी लगाए प्रभु से आशा
दर्शन किस विध पाए….(2) बन्दे ॥ शरण प्रभु की…
ना कर पाया ओ३म् का सिमरन
पापी रूप देख तड़पा मन
करनी पर पछताए….(2) बन्दे ॥ शरण प्रभु की…
क्या लेगा दुनियाँदारी से
प्रीत लगा प्रभु हितकारी से
जो सिमरे सुख पाए….(2) बन्दे ॥ शरण प्रभु की…
आस जो तुझको ईश-मिलन की
पाले रंगत आनन्दघन की
प्रेम रंग रंगाए….(2) बन्दे ॥ शरण प्रभु की…
वासना (हितकारी) लाभक, पक, हित करनेवाला










