मन की उलझन कैसे मिटाऊँ

0
9

पथिक भजन सर्वस्व

मन की उलझन कैसे मिटाऊँ

(तर्ज – सारी उमरां दे पै गये विछोड़े)

मन की उलझन मैं कैसे मिटाऊँ।
कोई सुनता नहीं। काँटे चुनता नहीं।
अपनी गाथा किसे मैं सुनाऊँ।
मन की उलझन मैं कैसे मिटाऊँ……..

१. हे पिता सुन ज़रा ! तेरा संसार है बेवफ़ा।
खुशियाँ देता नहीं। सुध भी लेता नहीं।
ग़म से भरपूर हूँ। बहुत मजबूर हूँ।
कैसे काँटों से दामन छुड़ाऊँ।
मन की उलझन मैं…….

२. हे प्रभो लोग तो ! वक्त पर काम आते नहीं।
सारे छोटे बड़े । बैठे हों या खड़े।
भक्त जन हैं सभी। पर न मिलते कभी।
मिलना चाहूँ तो मिलने न पाऊँ।
मन की उलझन मैं……..

३. आप सा कौन है! जिसको संकट में आवाज़ दूँ।
कष्ट हरता है तू। सुख से भरता है तू।
मुझको सज्ञान दो। ऐसा वरदान दो।
तेरे गुण ही सदा गुनगुनाऊँ।
मन की उलझन मैं…….

४. सामने दीखता। एक तेरा ही आधार है।
हर तरफ़ तू ही तू। तू ही तू है प्रभु।
सारा जग छोड़ कर । सबसे मुख मोड़ कर ।
तेरे दर पे ‘पथिक’ सर झुकाऊँ।
मन की उलझन मैं……..

🎶🎵मधुर भजन सुनने के लिए यहाँ क्लिक करे 👇🎵🎶