मनसे चेतसे ध्यि आकूतय उत चित्तये ।
मृत्यै श्रुताय॒ चक्षये विधेम ह॒विषा व॒यम् ॥ अथर्व. ६.४१.१
तर्जः मन में तुट्टा चिनुंगीदाने राग भूपाली
मन चन्द्रमा सा है जाने, इसे सौम्य गुणवाला मानें
यही हर्ष दे, यही पीड़ा दे, इसे मनन शक्ति द्वारा थामें ॥
॥ मन चंद्रमा ॥
है परमेश्वर भी पूर्ण चन्द्र, गुण कर्मस्वभाव से है वो मन्द्र
मनरूप समुद्र में भरते तरंग, आह्लाद का करते परिवर्धन (2)
मन की हवि से हम प्रार्थी बन, करें याचना, करें प्रार्थना
आयें शरण मन-शक्ति पाने ॥
॥ मन चन्द्रमा॥
प्रभु हममे मनन शक्ति भर दो, जिससे हम शास्त्रिय वचन सुनें
इन वचनों को सुनकर भगवन्, हम तदनुसार ही करें मनन
चित्त जन्य शक्ति पा कर के (2), हम हों समृद्ध और परिवृद्ध,
ना देना पशु-वृत्ति भानें॥
॥ मन चंद्रमा ॥
फिर ध्यान धारणा की शक्ति, इस मन में भर उसे प्रखर करो
उपयोगी ज्ञान को देर तलक, मम हृदय में धारित रखो
बल दृढ़ संकल्प का दान करो (2), दीक्षित हो व्रत जिसमें हो श्रत्
चित्ति का बल प्रभु, दो आने॥
॥ मन चंद्रमा ॥
हमें श्रोत जन्य और नेत्र जन्य, के ज्ञान का दो सर्वथा उत्कर्ष
जिससे जीवन होवे उन्नत, और श्रेष्ठ पायें तुमसे आदर्श
हे वृद्ध चन्द्र ! हे दिव्य मन्द्र! (2), बन मननशील हो सत्यसंध
मन चन्द्र के सम दो चमकाने ॥
॥मन चंद्रमा ॥
(सत्यसंथ) सत्यवादी।










