मैं कैसे अपने जीवन को सफल और सार्थक बना सकता हूं?

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मित्रों !

व्यक्ति स्वयं ही स्वयं का निर्माता है। बुद्धिपूर्वक तप, पुरुषार्थ व संघर्ष करके ही व्यक्ति स्वयं भीतर से सुंदर , पवित्र और परिपक्व बन जाता है। यदि अपने आप पर ध्यान नहीं देता तो अस्वस्थ , रोगी, आलसी, प्रमादी, अदूरदर्शी, व निराशावादी होकर स्वयं ही स्वयं को भीतर कुरूप, निराश, हताश और उदास बना लेता है। व्यक्ति अपना निर्माता वास्तव में स्वयं ही है।

निराश होकर रुक जाना ही असफलता है, और आशावादी व पुरुषार्थी होकर निरंतर प्रयास करना ही सफलता की ओर बढ़ना है। *यदि आप दूसरों में भी आशा, उत्साह का संचार करते हुए सफल मार्गदर्शन करते हो तो यह आप के जीवन की सफलता और सार्थकता है।* प्रत्येक व्यक्ति अवश्य ही किसी न किसी क्षेत्र में सफल अवश्य हो सकता है, आवश्यकता है तीव्र ईच्छा का होना, आवश्यक मार्गदर्शन और प्रेरणा प्राप्त होना, अविरत प्रचंड और अखंड पुरुषार्थ (मेहनत – कर्म ) का करना।

अतः

उठें ! और जागे! आगे बढ़े!

हम आप के साथ हैं।

आशा ही जीवन है।

प्रयास करते रहना ही जीवन है।

गिर कर उठ जाना ही जीवन है।

चरैवेति चरैवेति।

जीवन को बनाने में, जीवन ही सहारा है। यदि आप की सफल और सार्थक जीवनयात्रा हेतु मैं कुछ आप को सहयोग – सहकार – मार्गदर्शन – प्रेरणा या सहानुभूति दे सकूं, तो यह मेरा सौभाग्य होगा। क्या आप मुझे वह सौभाग्य – अवसर – सहमति देना चाहोगे??

आप मुझे नि:संकोच संपर्क कर सकते हो।

जिज्ञासु योग वेद साधक!

दिलीप वेलाणी। मुंबई।

Mobile : 9821377003

(संपर्क से पूर्व व्हाट्स एप संदेश से परस्पर समय की अनुकूलता बना लीजिएगा। धन्यवाद।)