मैं कंगाल बाप की बेटी जरूर हूँ

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मैं कंगाल बाप की बेटी जरूर हूँ

मैं कंगाल बाप की बेटी जरूर हूँ,
दुनिया की बुराइयों से बहुत दूर हूं।

पति ब्रत धर्म के नियम को मैंने समझा
और जीवन में ढाला,
कोई भी बुराई मेरे पास नहीं आई
मैंने जब से यह जीवन संभाला
बिना विचारे दुख दे डाला चूर चूर हूं

मैं आपके चरणों की दासी
जैसे रखोगे वैसे रहूंगी,
जितना भी चाहो उतना सताओ
नहीं जाकर कहीं भी कहूँगी,
जो भी दोगे दुख सहूंगी
क्योंकि मजबूर हूं ।।2।।

आपके घर कई नौकर प्रेमी
मुझे भी एक नौकर समझ लो,
मुझसे आपको जो दुख हुआ है
उसे भी एक ठोकर समझ लो,
पछताओगे खोकर समझ लो
बे कसूर हूँ………..।।3।।

सारा घर सुन सान था हर
एक व्यक्ति मौन था,
निःसहाय का सहाई घर
कसाई कौन था,
पिटते-पिटते गिर गई
बेहोश होकर करके निरभागी,
इकली पाई बन्द कमरे में
वह जब मुर्छा से जागी


सोचा इस घृणित जीवन से
तो मरना ही अच्छा है,
स्वार्थी दुनिया से किनारा
अब करना ही अच्छा है,
मरने की ठानी एक सुनो कहानी………